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4. An-Nisaa

The Women · Medinan · 176 ayahs

سُورَةُ النِّسَاءِ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 41–50 of 176

41

فَكَيْفَ إِذَا جِئْنَا مِن كُلِّ أُمَّةٍۭ بِشَهِيدٍۢ وَجِئْنَا بِكَ عَلَىٰ هَٰٓؤُلَآءِ شَهِيدًۭا

(ख़ैर दुनिया में तो जो चाहे करें) भला उस वक्त क्या हाल होगा जब हम हर गिरोह के गवाह तलब करेंगे और (मोहम्मद) तुमको उन सब पर गवाह की हैसियत में तलब करेंगे

तो क़यामत के दिन क्या हाल होगा, जब हम हर समुदाय के नबी को इस बात की गवाही देने के लिए लाएँगे जो कुछ उन्होंने किया है, और - ऐ नबी! - हम आपको आपकी उम्मत पर गवाह की हैसियत से पेश करेंगे?

42

يَوْمَئِذٍۢ يَوَدُّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَعَصَوُا۟ ٱلرَّسُولَ لَوْ تُسَوَّىٰ بِهِمُ ٱلْأَرْضُ وَلَا يَكْتُمُونَ ٱللَّهَ حَدِيثًۭا

उस दिन जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया और रसूल की नाफ़रमानी की ये आरज़ू करेंगे कि काश (वह पेवन्दे ख़ाक हो जाते) और उनके ऊपर से ज़मीन बराबर कर दी जाती और अफ़सोस ये लोग ख़ुदा से कोई बात उस दिन छुपा भी न सकेंगे

उस महान दिन में, अल्लाह का इनकार करने वाले और उसके रसूल की बात पर न चलने वाले इच्छा करेंगे कि काश वे मिट्टी हो गए होते, तो वे और धरती एक जैसे हो जाते। उस दिन वे अल्लाह से अपना कोई कर्म छिपा नहीं सकेंगे। क्योंकि अल्लाह उनकी ज़बानों पर मुहर लगा देगा, इसलिए वे बोल नहीं सकेंगी और उनके शरीर के अंगों को को अनुमति देगा तो वे उनके बुरे कामों की गवाही देंगे।

43

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَقْرَبُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَنتُمْ سُكَٰرَىٰ حَتَّىٰ تَعْلَمُوا۟ مَا تَقُولُونَ وَلَا جُنُبًا إِلَّا عَابِرِى سَبِيلٍ حَتَّىٰ تَغْتَسِلُوا۟ ۚ وَإِن كُنتُم مَّرْضَىٰٓ أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ أَوْ جَآءَ أَحَدٌۭ مِّنكُم مِّنَ ٱلْغَآئِطِ أَوْ لَٰمَسْتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَلَمْ تَجِدُوا۟ مَآءًۭ فَتَيَمَّمُوا۟ صَعِيدًۭا طَيِّبًۭا فَٱمْسَحُوا۟ بِوُجُوهِكُمْ وَأَيْدِيكُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَفُوًّا غَفُورًا

ऐ ईमानदारों तुम नशे की हालत में नमाज़ के क़रीब न जाओ ताकि तुम जो कुछ मुंह से कहो समझो भी तो और न जिनाबत की हालत में यहॉ तक कि ग़ुस्ल कर लो मगर राह गुज़र में हो (और गुस्ल मुमकिन नहीं है तो अलबत्ता ज़रूरत नहीं) बल्कि अगर तुम मरीज़ हो और पानी नुक़सान करे या सफ़र में हो तुममें से किसी का पैख़ाना निकल आए या औरतों से सोहबत की हो और तुमको पानी न मयस्सर हो (कि तहारत करो) तो पाक मिट्टी पर तैमूम कर लो और (उस का तरीक़ा ये है कि) अपने मुंह और हाथों पर मिट्टी भरा हाथ फेरो तो बेशक ख़ुदा माफ़ करने वाला है (और) बख्श ने वाला है

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जब तुम नशे की हालत में हो तो नमाज़ न पढ़ो, यहाँ तक कि नशा उतर जाए और जो कुछ तुम कहते हो उसमें भेद कर सको। (यह आदेश पूर्णतया शराब के हराम होने से पहले था)। इसी तरह जनाबत की हालत में, जब तक स्नान न कर लो, नमाज़ न पढ़ो और मस्जिदों में प्रवेश न करो, परंतु यदि मस्जिद में रुके बिना गुज़रते हुए चले जाओ, तो कोई बात नहीं है। तथा यदि तुम्हें ऐसी बीमारी हो जाए जिसके साथ पानी इस्तेमाल करना संभव न हो, या तुम यात्रा में हो, या तुममें से कोई अशुद्ध (बे-वुज़ू) हो जाए, या तुमने स्त्रियों से सहवास किया हो; फिर तुम्हें पानी न मिल सके, तो पाक मिट्टी से काम लो और उससे अपने चेहरे और हाथों का मसह कर लो। निश्चय अल्लाह तुम्हारी कोताहियों को माफ़ करने वाला और तुम्हें क्षमा करने वाला है।

44

أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ نَصِيبًۭا مِّنَ ٱلْكِتَٰبِ يَشْتَرُونَ ٱلضَّلَٰلَةَ وَيُرِيدُونَ أَن تَضِلُّوا۟ ٱلسَّبِيلَ

(ऐ रसूल) क्या तूमने उन लोगों के हाल पर नज़र नहीं की जिन्हें किताबे ख़ुदा का कुछ हिस्सा दिया गया था (मगर) वह लोग (हिदायत के बदले) गुमराही ख़रीदने लगे उनकी ऐन मुराद यह है कि तुम भी राहे रास्त से बहक जाओ

क्या - ऐ रसूल! - आप उन यहूदियों के हाल से अवगत नहीं हैं, जिन्हें अल्लाह ने तौरात के ज्ञान का कुछ भाग दिया, वे हिदायत के बदले गुमराही ख़रीद रहे हैं, तथा वे तुम्हें - ऐ मोमिनो! - रसूल के लाए हुए सीधे मार्ग से भटकाने के बड़े इच्छुक हैं; ताकि तुम उनके टेढ़े मार्ग पर चलने लगो!?

45

وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِأَعْدَآئِكُمْ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَلِيًّۭا وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ نَصِيرًۭا

और ख़ुदा तुम्हारे दुशमनों से ख़ूब वाक़िफ़ है और दोस्ती के लिए बस ख़ुदा काफ़ी है और हिमायत के वास्ते भी ख़ुदा ही काफ़ी है

अल्लाह तुम्हारे दुश्मनों को - ऐ मोमिनो! - तुमसे अधिक जानता है। अतः उसने तुम्हें उनका हाल बता दिया है और तुम्हारे लिए उनकी दुश्मनी को स्पष्ट कर दिया है। तथा अल्लाह एक संरक्षक के रूप में काफ़ी है जो उनकी शक्ति के विरुद्ध तुम्हारी रक्षा करता है, तथा अल्लाह एक सहायक के रूप में काफ़ी है जो तुम्हें उनकी चाल और उनके नुकसान पहुँचाने से बचाता है और उनके विरुद्ध तुम्हारी मदद करता है।

46

مِّنَ ٱلَّذِينَ هَادُوا۟ يُحَرِّفُونَ ٱلْكَلِمَ عَن مَّوَاضِعِهِۦ وَيَقُولُونَ سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَٱسْمَعْ غَيْرَ مُسْمَعٍۢ وَرَٰعِنَا لَيًّۢا بِأَلْسِنَتِهِمْ وَطَعْنًۭا فِى ٱلدِّينِ ۚ وَلَوْ أَنَّهُمْ قَالُوا۟ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا وَٱسْمَعْ وَٱنظُرْنَا لَكَانَ خَيْرًۭا لَّهُمْ وَأَقْوَمَ وَلَٰكِن لَّعَنَهُمُ ٱللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُونَ إِلَّا قَلِيلًۭا

(ऐ रसूल) यहूद से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बातों में उनके महल व मौक़े से हेर फेर डाल देते हैं और अपनी ज़बानों को मरोड़कर और दीन पर तानाज़नी की राह से तुमसे समेअना व असैना (हमने सुना और नाफ़रमानी की) और वसमअ गैरा मुसमइन (तुम मेरी सुनो ख़ुदा तुमको न सुनवाए) राअना मेरा ख्याल करो मेरे चरवाहे कहा करते हैं और अगर वह इसके बदले समेअना व अताअना (हमने सुना और माना) और इसमाआ (मेरी सुनो) और (राअना) के एवज़ उनजुरना (हमपर निगाह रख) कहते तो उनके हक़ में कहीं बेहतर होता और बिल्कुल सीधी बात थी मगर उनपर तो उनके कुफ़्र की वजह से ख़ुदा की फ़िटकार है

यहूदियों में कुछ लोग बहुत बुरे हैं, जो अल्लाह की उतारी हुई बात को बदल देते हैं। अतः उसे वह अर्थ पहना देते हैं, जो अल्लाह ने अवतरित नहीं किया है। जब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन्हें कोई आदेश देते हैं, तो वे आपसे कहते हैं : "हमने आपकी बात सुनी और हमने आपके आदेश की अवहेलना की।" और वे व्यंग्य करते हुए कहते हैं :"हम जो कहते हैं, उसे सुनें, आप सुन न पाएँ!" तथा वे "राइना" कहकर यह भ्रम फैलाते हैं कि उनका मतलब यह है कि :"आप हमारी बात पर ध्यान दीजिए", जबकि उनका मक़सद "रऊनत" अर्थात् बेवकूफी आदि की ओर इशारा करना होता है। वे इसके उच्चारण के समय अपनी ज़बान को मोड़ देते थे। वे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर शाप करना चाहते थे तथा उनका उद्देश्य (इस्लाम) धर्म पर लांक्षन करना होता था। यदि वे "हमने आपकी बात सुनी और हमने आपके आदेश की अवहेलना की" की जगह "हमने आपकी बात सुनी और आपके आदेश का पालन किया" कहते, तथा "आप हमारी बात सुनिए, आप सुन न पाएँ!" की जगह "हमारी बात सुनिए", तथा "राइना" कहने की जगह "ज़रा प्रतीक्षा करें कि हम आपकी बात समझ जाएँ" कहते; तो यह उनके लिए पहले कहे हुए शब्द से बेहतर और उससे अधिक न्यायसंगत होता। क्योंकि इसमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के व्यक्तित्व के योग्य शिष्टाचार पाया जाता है। लेकिन अल्लाह ने उन्हें शापित किया है। अतः उनके कुफ़्र के कारण उन्हें अपनी दया से दूर कर दिया है। इसलिए वे ऐसा ईमान नहीं लाएँगे, जो उनके लिए लाभदायक हो।

47

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَٰبَ ءَامِنُوا۟ بِمَا نَزَّلْنَا مُصَدِّقًۭا لِّمَا مَعَكُم مِّن قَبْلِ أَن نَّطْمِسَ وُجُوهًۭا فَنَرُدَّهَا عَلَىٰٓ أَدْبَارِهَآ أَوْ نَلْعَنَهُمْ كَمَا لَعَنَّآ أَصْحَٰبَ ٱلسَّبْتِ ۚ وَكَانَ أَمْرُ ٱللَّهِ مَفْعُولًا

पस उनमें से चन्द लोगों के सिवा और लोग ईमान ही न लाएंगे ऐ अहले किताब जो (किताब) हमने नाज़िल की है और उस (किताब) की भी तस्दीक़ करती है जो तुम्हारे पास है उस पर ईमान लाओ मगर क़ब्ल इसके कि हम कुछ लोगों के चेहरे बिगाड़कर उनके पुश्त की तरफ़ फेर दें या जिस तरह हमने असहाबे सबत (हफ्ते वालों) पर फिटकार बरसायी वैसी ही फिटकार उनपर भी करें

ऐ यहूदियो और ईसाइयो, जिन्हें किताब दी गई है, उस पुस्तक पर ईमान लाओ, जो हमने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारी है, जो तुम्हारे पास मौजूद तौरात एवं इंजील की पुष्टि करने हेतु आए हैं, इससे पहले कि हम चेहरों में मौजूद इंद्रियों को मिटा दें, और उन्हें उनके पीछे की दिशा में बना दें, या हम उन्हें अल्लाह की दया से वैसे ही निष्कासित कर दें, जैसे हमने शनिवार वालों को उससे निष्कासित किया था, जिन्होंने शनिवार के दिन शिकार से मनाही के बावजूद उसमें शिकार किया था। जिसके कारण अल्लाह ने उन्हें बंदर बना दिया। और अल्लाह का आदेश और उसका फ़ैसला अनिवार्य रूप से पूरा होकर रहता है।

48

إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَن يُشْرَكَ بِهِۦ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَآءُ ۚ وَمَن يُشْرِكْ بِٱللَّهِ فَقَدِ ٱفْتَرَىٰٓ إِثْمًا عَظِيمًا

और ख़ुदा का हुक्म किया कराया हुआ काम समझो ख़ुदा उस जुर्म को तो अलबत्ता नहीं माफ़ करता कि उसके साथ शिर्क किया जाए हॉ उसके सिवा जो गुनाह हो जिसको चाहे माफ़ कर दे और जिसने (किसी को) ख़ुदा का शरीक बनाया तो उसने बड़े गुनाह का तूफान बॉधा

अल्लाह इस बात को क्षमा नहीं करेगा कि उसके प्राणियों में से किसी को उसका साझी बनाया जाए, परंतु शिर्क और कुफ़्र से कमतर गुनाहों को, जिसके लिए चाहेगा, अपनी कृपा से क्षमा कर देगा, अथवा उनमें से जिसे चाहेगा, उसके गुनाहों के अनुसार, अपने न्याय के आधार पर, दंड देगा। तथा जिसने किसी को अल्लाह का साझी बनाया, उसने इतना बड़ा पाप किया कि उस पर मरने वाले को क्षमा नहीं किया जाएगा।

49

أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ يُزَكُّونَ أَنفُسَهُم ۚ بَلِ ٱللَّهُ يُزَكِّى مَن يَشَآءُ وَلَا يُظْلَمُونَ فَتِيلًا

(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों के हाल पर नज़र नहीं की जो आप बड़े मुक़द्दस बनते हैं (मगर उससे क्या होता है) बल्कि ख़ुदा जिसे चाहता है मुक़द्दस बनाता है और ज़ुल्म तो किसी पर धागे के बराबर हो ही गा नहीं

क्या आप - ऐ रसूल! - उन लोगों के मामले से अवगत नहीं हैं, जो खुद अपनी और अपने कार्यों की प्रशंसा करते हैं? बल्कि केवल अल्लाह ही है जो अपने बंदों में से जिसकी चाहे प्रशंसा करे और पवित्र बनाए, क्योंकि वह दिलों की गुप्त बातों को जानने वाला है। तथा उनके सत्कर्मों के सवाब में कुछ भी कमी नहीं की जाएगी, चाहे वह खजूर की गुठली के धागे के बराबर ही क्यों न हो।

50

ٱنظُرْ كَيْفَ يَفْتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلْكَذِبَ ۖ وَكَفَىٰ بِهِۦٓ إِثْمًۭا مُّبِينًا

(ऐ रसूल) ज़रा देखो तो ये लोग ख़ुदा पर कैसे कैसे झूठ तूफ़ान जोड़ते हैं और खुल्लम खुल्ला गुनाह के वास्ते तो यही काफ़ी है

(ऐ रसूल!) देखिए तो सही कि वे लोग स्वयं की प्रशंसा करके कैसे अल्लाह पर मिथ्या आरोप लगा रहे हैं! और उनकी गुमराही को स्पष्ट करने के लिए यही गुनाह काफ़ी है।

Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.