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4. An-Nisaa

The Women · Medinan · 176 ayahs

سُورَةُ النِّسَاءِ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 21–30 of 176

21

وَكَيْفَ تَأْخُذُونَهُۥ وَقَدْ أَفْضَىٰ بَعْضُكُمْ إِلَىٰ بَعْضٍۢ وَأَخَذْنَ مِنكُم مِّيثَٰقًا غَلِيظًۭا

और क्या तुम उसको (वापस लोगे हालॉकि तुममें से) एक दूसरे के साथ ख़िलवत कर चुका है और बीवियॉ तुमसे (निकाह के वक्त नुक़फ़ा वगैरह का) पक्का क़रार ले चुकी हैं

भला तुम उन्हें दिया हुआ महर कैसे वापस लोगे, जबकि तुम्हारे बीच एक रिश्ता और स्नेह स्थापित हो चुका, तथा तुम एक-दूसरे से लाभान्वित और एक-दूसरे के रहस्यों से अवगत हो चुके हो। इसके बाद उनके हाथों में मौजूद धन की लालच करना बहुत बुरी और घृणित बात है, जबकि वे तुमसे दृढ़ और पक्का वचन (भी) ले चुकी हैं। और वह वचन अल्लाह के शब्द और उसकी शरीयत के द्वारा उन्हें हलाल ठहराना है।

22

وَلَا تَنكِحُوا۟ مَا نَكَحَ ءَابَآؤُكُم مِّنَ ٱلنِّسَآءِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ فَٰحِشَةًۭ وَمَقْتًۭا وَسَآءَ سَبِيلًا

और जिन औरतों से तुम्हारे बाप दादाओं से (निकाह) जमाअ (अगरचे ज़िना) किया हो तुम उनसे निकाह न करो मगर जो हो चुका (वह तो हो चुका) वह बदकारी और ख़ुदा की नाख़ुशी की बात ज़रूर थी और बहुत बुरा तरीक़ा था

और तुम उन स्त्रियों से निकाह न करो, जिनसे तुम्हारे पिताओं ने निकाह किया है, क्योंकि यह हराम (निषिद्ध) है। परंतु जो इस्लाम से पहले ऐसा हो चुका है, उसपर कोई पकड़ नहीं है। इसके हराम होने का कारण यह है कि बेटों का अपने पिताओं की पत्नियों से विवाह करना अत्यन्त घृणित बात है तथा ऐसा करने वाले पर अल्लाह के क्रोध का कारण है और यह चलने का एक बुरा रास्ता है।

23

حُرِّمَتْ عَلَيْكُمْ أُمَّهَٰتُكُمْ وَبَنَاتُكُمْ وَأَخَوَٰتُكُمْ وَعَمَّٰتُكُمْ وَخَٰلَٰتُكُمْ وَبَنَاتُ ٱلْأَخِ وَبَنَاتُ ٱلْأُخْتِ وَأُمَّهَٰتُكُمُ ٱلَّٰتِىٓ أَرْضَعْنَكُمْ وَأَخَوَٰتُكُم مِّنَ ٱلرَّضَٰعَةِ وَأُمَّهَٰتُ نِسَآئِكُمْ وَرَبَٰٓئِبُكُمُ ٱلَّٰتِى فِى حُجُورِكُم مِّن نِّسَآئِكُمُ ٱلَّٰتِى دَخَلْتُم بِهِنَّ فَإِن لَّمْ تَكُونُوا۟ دَخَلْتُم بِهِنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ وَحَلَٰٓئِلُ أَبْنَآئِكُمُ ٱلَّذِينَ مِنْ أَصْلَٰبِكُمْ وَأَن تَجْمَعُوا۟ بَيْنَ ٱلْأُخْتَيْنِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا

(मुसलमानों हसबे जेल) औरतें तुम पर हराम की गयी हैं तुम्हारी माएं (दादी नानी वगैरह सब) और तुम्हारी बेटियॉ (पोतियॉ) नवासियॉ (वगैरह) और तुम्हारी बहनें और तुम्हारी फुफियॉ और तुम्हारी ख़ालाएं और भतीजियॉ और भंजियॉ और तुम्हारी वह माएं जिन्होंने तुमको दूध पिलाया है और तुम्हारी रज़ाई (दूध शरीक) बहनें और तुम्हारी बीवीयों की माँए और वह (मादर ज़िलो) लड़कियां जो तुम्हारी गोद में परवरिश पा चुकी हो और उन औरतों (के पेट) से (पैदा हुई) हैं जिनसे तुम हमबिस्तरी कर चुके हो हाँ अगर तुमने उन बीवियों से (सिर्फ निकाह किया हो) हमबिस्तरी न की तो अलबत्ता उन मादरज़िलों (लड़कियों से) निकाह (करने में) तुम पर कुछ गुनाह नहीं है और तुम्हारे सुलबी लड़को (पोतों नवासों वगैरह) की बीवियॉ (बहुएं) और दो बहनों से एक साथ निकाह करना मगर जो हो चुका (वह माफ़ है) बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

अल्लाह ने तुम्हारे लिए विवाह हराम किया है, तुम्हारी माताओं से, चाहे वे कितनी ही दूर तक ऊपर चली जाएँ; अर्थात् : माँ की माँ और उसकी दादी, चाहे पिता की तरफ से हो या माता। और तुम्हारी बेटियों से, चाहे वे कितनी ही दूर तक नीचे चली जाएँ; अर्थात् : उसकी बेटी और उसकी बेटी की बेटी, इसी तरह बेटे की बेटियाँ और बेटी की बेटियाँ चाहे वे कितनी ही दूर तक नीचे चली जाएँ। और तुम्हारी सगी बहनों, या बाप शरीक (अल्लाती) या माँ शरीक (अख़्याफ़ी) बहनों से। और तुम्हारी फूफियों से, इसी तरह तुम्हारे पिताओं और माताओं की फूफियों से, चाहे वे कितनी दूर तक ऊपर चली जाएँ। और तुम्हारी खालाओं से, और इसी तरह तुम्हारी माताओं और पिताओं की खालाओं से, चाहे वे कितनी दूर तक ऊपर चली जाएँ। और भाई की बेटियों तथा बहन की बेटियों और उनकी बेटियों से, चाहे वे कितनी दूर तक नीचे चली जाएँ। और तुम्हारी उन माताओं से जिन्होंने तुम्हें दूध पिलाया है, और तुम्हारी दूध में साझीदार बहनों से, और तुम्हारी पत्नियों की माताओं से, चाहे तुम्हारा उनसे मिलन हुआ हो या न हुआ हो। और तुम्हारी पत्नियों की उन बेटियों से, जो तुम्हारे सिवा किसी अन्य पति से हों और जो अधिकतर तुम्हारे घरों में ही पलती बढ़ती हैं, इसी तरह यदि वे तुम्हारे घरों में न पली हों, अगर तुमने उनकी माताओं से मिलन कर लिया हो। लेकिन यदि तुमने उनकी माताओं से मिलन न किया हो, तो उनकी बेटियों से निकाह करने में कोई आपत्ति नहीं है। तथा तुम्हारे लिए तुम्हारे सगे बेटों की पत्नियों से विवाह करना भी हराम है, यद्यपि उनका उनसे मिलन न हुआ हो। और इस हुक्म में तुम्हारे दूध में साझीदार बेटों की पत्नियाँ भी शामिल हैं। तथा तुम्हारे लिए दो नसबी या दूध शरीक बहनों को एक साथ निकाह में रखना भी हराम है। हाँ, अज्ञानता के समयकाल में जो हो चुका, सो हो चुका। अल्लाह ने उसे क्षमा कर दिया। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को माफ़ करने वाला, उनपर दया करने वाला है। इसी तरह सुन्नत (हदीस) से साबित है कि किसी महिला और उसकी फूफी या उसकी खाला को एक साथ (निकाह) में रखना निषिद्ध है।

24

۞ وَٱلْمُحْصَنَٰتُ مِنَ ٱلنِّسَآءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَٰنُكُمْ ۖ كِتَٰبَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ ۚ وَأُحِلَّ لَكُم مَّا وَرَآءَ ذَٰلِكُمْ أَن تَبْتَغُوا۟ بِأَمْوَٰلِكُم مُّحْصِنِينَ غَيْرَ مُسَٰفِحِينَ ۚ فَمَا ٱسْتَمْتَعْتُم بِهِۦ مِنْهُنَّ فَـَٔاتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ فَرِيضَةًۭ ۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا تَرَٰضَيْتُم بِهِۦ مِنۢ بَعْدِ ٱلْفَرِيضَةِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًۭا

और शौहरदार औरतें मगर वह औरतें जो (जिहाद में कुफ्फ़ार से) तुम्हारे कब्ज़े में आ जाएं हराम नहीं (ये) ख़ुदा का तहरीरी हुक्म (है जो) तुमपर (फ़र्ज़ किया गया) है और उन औरतों के सिवा (और औरतें) तुम्हारे लिए जायज़ हैं बशर्ते कि बदकारी व ज़िना नहीं बल्कि तुम इफ्फ़त या पाकदामिनी की ग़रज़ से अपने माल (व मेहर) के बदले (निकाह करना) चाहो हॉ जिन औरतों से तुमने मुताअ किया हो तो उन्हें जो मेहर मुअय्यन किया है दे दो और मेहर के मुक़र्रर होने के बाद अगर आपस में (कम व बेश पर) राज़ी हो जाओ तो उसमें तुमपर कुछ गुनाह नहीं है बेशक ख़ुदा (हर चीज़ से) वाक़िफ़ और मसलेहतों का पहचानने वाला है

शादी-शुदा स्त्रियों से निकाह करना तुम्हारे लिए हराम कर दिया गया है। परंतु जो स्त्रियाँ अल्लाह की राह में जिहाद करते समय, बंदी बनकर तुम्हारे पास आएं, उनसे एक मासिक धर्म के पश्चात जब यह स्पष्ट हो जाए कि वे गर्भवती नहीं हैं, तुम्हारे लिए संभोग करना जायज़ है। यह (हुक्म) अल्लाह ने तुम पर फ़र्ज़ कर दिया है। तथा अल्लाह ने इनके अलावा दूसरी स्त्रियों को तुम्हारे लिए हलाल किया है कि तुम अपना माल खर्च करके, हलाल तरीक़े से, अपने सतीत्व की रक्षा करो, तुम्हारा उद्देश्य व्यभिचार का न हो। फिर जिन स्त्रियों से तुम निकाह करके लाभ उठाओ, उन्हें उनका महर चुका दो, जो अल्लाह ने तुम्हारे ऊपर फ़र्ज़ किया है। किन्तु वाजिब महर के निर्धारण के बाद, उसमें कुछ वृद्धि करने या कुछ माफ करने पर तुम्हारी आपस में सहमति हो जाती है, तो इसमें तुम पर कोई पाप नहीं है। अल्लाह अपनी सृष्टि से अवगत है, उनकी कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है। वह अपने प्रबंधन और विधान में हिकमत वाला है।

25

وَمَن لَّمْ يَسْتَطِعْ مِنكُمْ طَوْلًا أَن يَنكِحَ ٱلْمُحْصَنَٰتِ ٱلْمُؤْمِنَٰتِ فَمِن مَّا مَلَكَتْ أَيْمَٰنُكُم مِّن فَتَيَٰتِكُمُ ٱلْمُؤْمِنَٰتِ ۚ وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِإِيمَٰنِكُم ۚ بَعْضُكُم مِّنۢ بَعْضٍۢ ۚ فَٱنكِحُوهُنَّ بِإِذْنِ أَهْلِهِنَّ وَءَاتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ مُحْصَنَٰتٍ غَيْرَ مُسَٰفِحَٰتٍۢ وَلَا مُتَّخِذَٰتِ أَخْدَانٍۢ ۚ فَإِذَآ أُحْصِنَّ فَإِنْ أَتَيْنَ بِفَٰحِشَةٍۢ فَعَلَيْهِنَّ نِصْفُ مَا عَلَى ٱلْمُحْصَنَٰتِ مِنَ ٱلْعَذَابِ ۚ ذَٰلِكَ لِمَنْ خَشِىَ ٱلْعَنَتَ مِنكُمْ ۚ وَأَن تَصْبِرُوا۟ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ

और तुममें से जो शख्स आज़ाद इफ्फ़तदार औरतों से निकाह करने की माली हैसियत से क़ुदरत न रखता हो तो वह तुम्हारी उन मोमिना लौन्डियों से जो तुम्हारे कब्ज़े में हैं निकाह कर सकता है और ख़ुदा तुम्हारे ईमान से ख़ूब वाक़िफ़ है (ईमान की हैसियत से तो) तुममें एक दूसरे का हमजिन्स है पस (बे ताम्मुल) उनके मालिकों की इजाज़त से लौन्डियों से निकाह करो और उनका मेहर हुस्ने सुलूक से दे दो मगर उन्हीं (लौन्डियो) से निकाह करो जो इफ्फ़त के साथ तुम्हारी पाबन्द रहें न तो खुले आम ज़िना करना चाहें और न चोरी छिपे से आशनाई फिर जब तुम्हारी पाबन्द हो चुकी उसके बाद कोई बदकारी करे तो जो सज़ा आज़ाद बीवियों को दी जाती है उसकी आधी (सज़ा) लौन्डियों को दी जाएगी (और लौन्डियों) से निकाह कर भी सकता है तो वह शख्स जिसको ज़िना में मुब्तिला हो जाने का ख़ौफ़ हो और सब्र करे तो तुम्हारे हक़ में ज्यादा बेहतर है और ख़ुदा बख्शने वाला मेहरबान है

तथा - ऐ पुरुषो - तुममें से जो व्यक्ति पैसे की कमी के कारण आज़ाद स्त्रियों से विवाह करने में सक्षम न हो, उसके लिए किसी अन्य व्यक्ति के स्वामित्व में मौजूद दासियों से निकाह करना जायज़ है, यदि वे तुम्हें ईमान वाली दिखाई दें, जबकि तुम्हारे ईमान की सच्चाई और भीतरी स्थिति को अल्लाह ही बेहतर जानता है। तुम और वे (दासियाँ) धर्म एवं मानवता में बराबर हैं, इसलिए उनसे शादी करने में शर्म महसूस न करो। सो, तुम उनसे उनके मालिकों की अनुमति से विवाह कर लो और उनका महर बिना किसी कमी या टाल-मटोल के उन्हें अदा कर दो। परंतु यह उस स्थिति में है जब वे पाकदामन (निष्कलंक चरित्र) हों, खुल्लम खुल्ला व्यभिचार करने वाली न हों, तथा गुप्त रूप से व्यभिचार के लिए मित्र रखने वाली न हों। जब वे शादी कर लें, फिर उसके बाद व्यभिचार में लिप्त हो जाएं, तो उन्हें आज़ाद स्त्रियों का आधा दंड दिया जाएगा। अर्थात् पचास कोड़े लगाए जाएंगे, लेकिन आज़ाद शादीशुदा स्त्रियों की तरह उन्हें संगसार नहीं किया जाएगा। सच्चरित्र ईमान वाली दासियों से निकाह करने की यह अनुमति, उसके लिए है, जिसे व्यभिचार में पड़ने का डर हो और वह आज़ाद स्त्रियों से निकाह करने की शक्ति न रखता हो। जबकि दासियों के निकाह से धैर्य करना (अर्थात् रुक जाना) बेहतर है; ताकि संतान दासता से सुरक्षित रहे।अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला और उनपर दया करने वाला है। और यह उसकी दया में से है कि उसने उनके लिए, आज़ाद स्त्रियों से निकाह करने में असमर्थ होने की स्थिति में, व्यभिचार में पड़ने के डर के समय दासियों से निकाह करना धर्मसंगत कर दिया है।

26

يُرِيدُ ٱللَّهُ لِيُبَيِّنَ لَكُمْ وَيَهْدِيَكُمْ سُنَنَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ وَيَتُوبَ عَلَيْكُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ

ख़ुदा तो ये चाहता है कि (अपने) एहकाम तुम लोगों से साफ़ साफ़ बयान कर दे और जो (अच्छे) लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनके तरीक़े पर चला दे और तुम्हारी तौबा कुबूल करे और ख़ुदा तो (हर चीज़ से) वाक़िफ़ और हिकमत वाला है

अल्लाह तआला तुम्हारे लिए इन प्रावधानों को निर्मित करके तुम्हारे लिए अपनी शरीयत और धर्म की निशानियों एवं दुनिया व आख़िरत में तुम्हारे हितों की चीज़ों को बयान करना चाहता है। तथा वह तुम्हारा, हलाल व हराम ठहराने में तुमसे पूर्व नबियों के तरीक़ों, उनके अच्छे गुणों और उनके सराहनीय आचरण की ओर, मार्गदर्शन करना चाहता है, ताकि तुम उनका अनुसरण करो। अल्लाह यह भी चाहता है कि तुम्हें अपनी अवज्ञा से हटाकर अपने आज्ञापालन की ओर फेर दे। अल्लाह उस चीज़ से अवगत है जिसमें उसके बंदों का हित है, चुनाँचे वह उसे उनके लिए धर्मसंगत बना देता है। वह अपने विधान और उनके मामलों के प्रबंधन में हिकमात वाला है।

27

وَٱللَّهُ يُرِيدُ أَن يَتُوبَ عَلَيْكُمْ وَيُرِيدُ ٱلَّذِينَ يَتَّبِعُونَ ٱلشَّهَوَٰتِ أَن تَمِيلُوا۟ مَيْلًا عَظِيمًۭا

और ख़ुदा तो चाहता है कि तुम्हारी तौबा क़ुबूल

अल्लाह चाहता है कि तुम्हारी तौबा क़बूल करे और तुम्हारे पापों को क्षमा कर दे, जबकि अपनी इच्छाओं के पीछे चलने वाले चाहते हैं कि तुम हिदायत के मार्ग से बहुत दूर हो जाओ।

28

يُرِيدُ ٱللَّهُ أَن يُخَفِّفَ عَنكُمْ ۚ وَخُلِقَ ٱلْإِنسَٰنُ ضَعِيفًۭا

करे और जो लोग नफ़सियानी ख्वाहिश के पीछे पडे हैं वह ये चाहते हैं कि तुम लोग (राहे हक़ से) बहुत दूर हट जाओ और ख़ुदा चाहता है कि तुमसे बार में तख़फ़ीफ़ कर दें क्योंकि आदमी तो बहुत कमज़ोर पैदा किया गया है

अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी शरीयत में आसानी पैदा करना चाहता है। इसी कारण वह तुम्हें ऐसी चीज़ का आदेश नहीं देता, जो तुम्हारी शक्ति से बाहर हो। क्योंकि वह मनुष्य की अपनी रचना एवं व्यवहार में कमज़ोरी से अवगत है।

29

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَأْكُلُوٓا۟ أَمْوَٰلَكُم بَيْنَكُم بِٱلْبَٰطِلِ إِلَّآ أَن تَكُونَ تِجَٰرَةً عَن تَرَاضٍۢ مِّنكُمْ ۚ وَلَا تَقْتُلُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًۭا

ए ईमानवालों आपस में एक दूसरे का माल नाहक़ न खा जाया करो लेकिन (हॉ) तुम लोगों की बाहमी रज़ामन्दी से तिजारत हो (और उसमें एक दूसरे का माल हो तो मुज़ाएक़ा नहीं) और अपना गला आप घूंट के अपनी जान न दो (क्योंकि) ख़ुदा तो ज़रूर तुम्हारे हाल पर मेहरबान है

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! तुम एक दूसरे का माल अवैध रूप से न लो, जैसे- जबरन क़ब्ज़ा, चोरी और रिश्वत आदि। परंतु यदि वह धन दोनों पक्षों की आपसी सहमति से होने वाले व्यवसाय का धन हो, तो तुम्हारे लिए उसको खाना और उसमें अपना अधिकार चलाना जायज़ है। तथा तुम एक-दूसरे की हत्या न करो और न तुममें से कोई अपने आपकी हत्या करे और न खुद को हलाकत में डाले। निःसंदेह अल्लाह तुमपर बड़ा दयावान् है और यह उसकी दया ही है कि उसने तुम्हारी जानों, तुम्हारे धनों और तुम्हारी इज्जत को हराम क़रार दिया है।

30

وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ عُدْوَٰنًۭا وَظُلْمًۭا فَسَوْفَ نُصْلِيهِ نَارًۭا ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرًا

और जो शख्स जोरो ज़ुल्म से नाहक़ ऐसा करेगा (ख़ुदकुशी करेगा) तो (याद रहे कि) हम बहुत जल्द उसको जहन्नुम की आग में झोंक देंगे यह ख़ुदा के लिये आसान है

जो व्यक्ति वह काम करेगा जिससे वह मना किया गया है; चुनाँचे वह किसी का धन खाएगा या किसी की हत्या करेगा, वह भी अनजाने या भूलवश नहीं, बल्कि जान-बूझकर और ज़्यादती करते हुए; तो क़ियामत के दिन अल्लाह उसे एक बड़ी आग में झोंक देगा। वह उसकी गर्मी सहेगा और उसकी यातना झेलेगा। यह कार्य अल्लाह के लिए बड़ा आसान है, क्योंकि वह हर कार्य की ताक़त रखता है, उसे कोई वस्तु विवश नहीं कर सकती।

Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.