Muslim99Muslim99
← Tafsir library

9. At-Tawba

The Repentance · Medinan · 129 ayahs

سُورَةُ التَّوۡبَةِ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 41–50 of 129

41

ٱنفِرُوا۟ خِفَافًۭا وَثِقَالًۭا وَجَٰهِدُوا۟ بِأَمْوَٰلِكُمْ وَأَنفُسِكُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌۭ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ

(मुसलमानों) तुम हलके फुलके (हॅसते) हो या भारी भरकम (मसलह) बहर हाल जब तुमको हुक्म दिया जाए फौरन चल खड़े हो और अपनी जानों से अपने मालों से ख़ुदा की राह में जिहाद करो अगर तुम (कुछ जानते हो तो) समझ लो कि यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है

(ऐ मोमिनो!) तुम कठिनाई और आराम में, युवा और बूढ़े अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए निकल पड़ो और अपने धनों और अपनी जानों के साथ जिहाद करो। क्योंकि यह निकलना और धनों और जानों के साथ जिहाद करना, दुनिया एवं आख़िरत के जीवन में, घर में बैठे रहने और जान एवं माल की सुरक्षा से चिपके रहने से ज़्यादा फायदेमंद है। यदि तुम इसका ज्ञान रखते हो, तो इसके लालायित बनो।

42

لَوْ كَانَ عَرَضًۭا قَرِيبًۭا وَسَفَرًۭا قَاصِدًۭا لَّٱتَّبَعُوكَ وَلَٰكِنۢ بَعُدَتْ عَلَيْهِمُ ٱلشُّقَّةُ ۚ وَسَيَحْلِفُونَ بِٱللَّهِ لَوِ ٱسْتَطَعْنَا لَخَرَجْنَا مَعَكُمْ يُهْلِكُونَ أَنفُسَهُمْ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ إِنَّهُمْ لَكَٰذِبُونَ

(ऐ रसूल) अगर सरे दस्त फ़ायदा और सफर आसान होता तो यक़ीनन ये लोग तुम्हारा साथ देते मगर इन पर मुसाफ़त (सफ़र) की मशक़क़त (सख्ती) तूलानी हो गई और अगर पीछे रह जाने की वज़ह से पूछोगे तो ये लोग फौरन ख़ुदा की क़समें खॉएगें कि अगर हम में सकत होती तो हम भी ज़रूर तुम लोगों के साथ ही चल खड़े होते ये लोग झूठी कसमें खाकर अपनी जान आप हलाक किए डालते हैं और ख़ुदा तो जानता है कि ये लोग बेशक झूठे हैं

यदि आप जिसकी ओर उन मुनाफ़िक़ों को बुला रहे थे, जिन्होंने आपसे पीछे रहने की अनुमति माँगी थी, आसानी से प्राप्त होने वाला ग़नीमत का धन और बिना कठिनाई का सफ़र होता, तो वे (ऐ नबी!) आपका अवश्य अनुसरण करते। लेकिन वह फ़ासला जो आपने उनको शत्रु के पास जाने के लिए तय करने को कहा था, उनसे बहुत दूर था, सो वे पीछे रह गए। और जब आप (युद्ध से) उनके पास लौटेंगे, तो ये पीछे रहने की अनुमति माँगने वाले मुनाफ़िक़ अल्लाह की क़समें खाकर कहेंगे : अगर हम आपके साथ जिहाद में निकलने की ताक़त रखते, तो हम ज़रूर निकलते। वे जिहाद से पीछे रहकर और इन झूठी क़समों के कारण, खुद को अल्लाह की सज़ा के लिए पेश करके, अपनी तबाही मोल ले रहे हैं। जबकि अल्लाह जानता है कि निश्चय वे अपने दावे और अपनी इन क़समों में झूठे हैं।

43

عَفَا ٱللَّهُ عَنكَ لِمَ أَذِنتَ لَهُمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكَ ٱلَّذِينَ صَدَقُوا۟ وَتَعْلَمَ ٱلْكَٰذِبِينَ

(ऐ रसूल) ख़ुदा तुमसे दरगुज़र फरमाए तुमने उन्हें (पीछे रह जाने की) इजाज़त ही क्यों दी ताकि (तुम) अगर ऐसा न करते तो) तुम पर सच बोलने वाले (अलग) ज़ाहिर हो जाते और तुम झूटों को (अलग) मालूम कर लेते

अल्लाह ने (ऐ रसूल!) आपके उन्हें पीछे रहने की अनुमति देने के इज्तिहाद (निर्णय) को क्षमा कर दिया। आपने उन्हें इसकी अनुमति क्यों दी? यहाँ तक कि आपके लिए यह स्पष्ट हो जाता कि कौन लोग अपने बहाने में सच्चे हैं और कौन झूठे। ताकि आप उनमें से सच्चे लोगों को अनुमति देते, न कि झूठे लोगों को।

44

لَا يَسْتَـْٔذِنُكَ ٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْءَاخِرِ أَن يُجَٰهِدُوا۟ بِأَمْوَٰلِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِٱلْمُتَّقِينَ

(ऐ रसूल) जो लोग (दिल से) ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान रखते हैं वह तो अपने माल से और अपनी जानों से जिहाद (न) करने की इजाज़त मॉगने के नहीं (बल्कि वह ख़ुद जाऎंगे) और ख़ुदा परहेज़गारों से खूब वाक़िफ है

(ऐ रसूल!) जो लोग अल्लाह और क़ियामत के दिन पर सच्चा ईमान रखते हैं, उनका यह काम नहीं है कि अपने धनों और अपनी जानों के साथ अल्लाह के मार्ग में जिहाद करने से पीछे रहने की आपसे अनुमति माँगें, बल्कि उनका हाल यह होना चाहिए कि जब उनसे निकलने को कहा जाए, तो निकल पड़ें और अपने धनों और अपनी जानों के साथ जिहाद करें। और अल्लाह अपने उन डर रखने वाले बंदों को जानता है, जो आपसे उसी समय अनुमति माँगते हैं, जब उनके साथ कोई ऐसी मजबूरी हो, जो उन्हें आपके साथ निकलने से रोकती हो।

45

إِنَّمَا يَسْتَـْٔذِنُكَ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْءَاخِرِ وَٱرْتَابَتْ قُلُوبُهُمْ فَهُمْ فِى رَيْبِهِمْ يَتَرَدَّدُونَ

(पीछे रह जाने की) इजाज़त तो बस वही लोग मॉगेंगे जो ख़ुदा और रोजे आख़िरत पर ईमान नहीं रखते और उनके दिल (तरह तरह) के शक़ कर रहे है तो वह अपने शक़ में डावॉडोल हो रहे हैं

(ऐ रसूल!) जो लोग आपसे अल्लाह की राह में जिहाद से पीछे रहने की अनुमति माँग रहे हैं, वे मुनाफ़िक़ लोग हैं, जो न अल्लाह पर ईमान रखते हैं और न क़ियामत के दिन पर ईमान रखते हैं, तथा उनके दिलों में अल्लाह के धर्म के बारे में शक है। अतः वे अपने संदेह में भ्रमित भटक रहे हैं, सत्य का मार्ग नहीं पाते हैं।

46

۞ وَلَوْ أَرَادُوا۟ ٱلْخُرُوجَ لَأَعَدُّوا۟ لَهُۥ عُدَّةًۭ وَلَٰكِن كَرِهَ ٱللَّهُ ٱنۢبِعَاثَهُمْ فَثَبَّطَهُمْ وَقِيلَ ٱقْعُدُوا۟ مَعَ ٱلْقَٰعِدِينَ

(कि क्या करें क्या न करें) और अगर ये लोग (घर से) निकलने की ठान लेते तो (कुछ न कुछ सामान तो करते मगर (बात ये है) कि ख़ुदा ने उनके साथ भेजने को नापसन्द किया तो उनको काहिल बना दिया और (गोया) उनसे कह दिया गया कि तुम बैठने वालों के साथ बैठे (मक्खी मारते) रहो

यदि वे अपने इस दावे में सच्चे होते कि वे आपके साथ अल्लाह की राह में जिहाद के लिए निकलना चाहते थे, तो वे उपकरण तैयार करके अवश्य उसके लिए तैयारी करते। परंतु अल्लाह ने उनका आपके साथ निकलना पसंद नहीं किया। इसलिए उनके लिए निकलना भारी बना दिया यहाँ तक कि उन्होंने अपने घरों में बैठने को तरजीह दी।

47

لَوْ خَرَجُوا۟ فِيكُم مَّا زَادُوكُمْ إِلَّا خَبَالًۭا وَلَأَوْضَعُوا۟ خِلَٰلَكُمْ يَبْغُونَكُمُ ٱلْفِتْنَةَ وَفِيكُمْ سَمَّٰعُونَ لَهُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِٱلظَّٰلِمِينَ

अगर ये लोग तुममें (मिलकर) निकलते भी तो बस तुममे फ़साद ही बरपा कर देते और तुम्हारे हक़ में फ़ितना कराने की ग़रज़ से तुम्हारे दरमियान (इधर उधर) घोड़े दौड़ाते फिरते और तुममें से उनके जासूस भी हैं (जो तुम्हारी उनसे बातें बयान करते हैं) और ख़ुदा शरीरों से ख़ूब वाक़िफ़ है

इन मुनाफ़िक़ों का तुम्हारे साथ न निकलना ही अचछा था। यदि वे तुम्हरे साथ निकलते, तो तुम्हारी हिम्मत तोड़कर और संदेह पैदा करके, तुम्हारे अंदर बिगाड़ के सिवा कुछ न बढ़ाते, और तुम्हें विभाजित करने के लिए तुम्हारे बीच द्वेष की बातें फैलाते। और (ऐ नबी!) तुम्हारे अंदर ऐसे लोग भी मौजूद हैं, जो उनके फैलाए हुए झूठ को सुनते हैं, उसे स्वीकार करते हैं और फैलाते हैं। जिसके कारण तुम्हारे बीच मतभेद पैदा होता है। और अल्लाह उन अत्याचारी मुनाफ़िकों को भली-भाँति जानता है, जो ईमान वालों के बीच साज़िशें करते हैं और संदेह फैलाते हैं।

48

لَقَدِ ٱبْتَغَوُا۟ ٱلْفِتْنَةَ مِن قَبْلُ وَقَلَّبُوا۟ لَكَ ٱلْأُمُورَ حَتَّىٰ جَآءَ ٱلْحَقُّ وَظَهَرَ أَمْرُ ٱللَّهِ وَهُمْ كَٰرِهُونَ

(ए रसूल) इसमें तो शक़ नहीं कि उन लोगों ने पहले ही फ़साद डालना चाहा था और तुम्हारी बहुत सी बातें उलट पुलट के यहॉ तक कि हक़ आ पहुंचा और ख़ुदा ही का हुक्म ग़ालिब रहा और उनको नागवार ही रहा

ये मुनाफ़िक़ लोग तबूक के युद्ध से पहले भी मुसलमानों के बीच मतभेद पैदा करके और उनकी एकता को भंग करके उपद्रव मचाने का प्रयास कर चुके हैं, तथा तरकीबों की व्यवस्था करके (ऐ रसूल!) आपके लिए मामलों में विविधता लाते रहे हैं और उलट-फेर करते रहे हैं, शायद उनकी चालें जिहाद करने के आपके संकल्प को प्रभावित कर दें, यहाँ तक कि आपके लिए अल्लाह की मदद और उसका समर्थन आ गया और अल्लाह ने अपने दीन को प्रभुत्व प्रदान किया और अपने दुश्मनों को वशीभूत कर दिया। जबकि वे इसे नापसंद करते थे; क्योंकि वे सत्य पर असत्य की जीत चाहते थे।

49

وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ ٱئْذَن لِّى وَلَا تَفْتِنِّىٓ ۚ أَلَا فِى ٱلْفِتْنَةِ سَقَطُوا۟ ۗ وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةٌۢ بِٱلْكَٰفِرِينَ

उन लोगों में से बाज़ ऐसे भी हैं जो साफ कहते हैं कि मुझे तो (पीछे रह जाने की) इजाज़त दीजिए और मुझ बला में न फॅसाइए (ऐ रसूल) आगाह हो कि ये लोग खुद बला में (औंधे मुँह) गिर पड़े और जहन्नुम तो काफिरों का यक़ीनन घेरे हुए ही हैं

मुनाफ़िक़ों में से कुछ ऐसे हैं, जो गढ़े हुए बहाने पेश करते हैं और कहते हैं : ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे जिहाद से पीछे रहने की अनुमति प्रदान करें और मुझे अपने साथ निकलने पर मजबूर न करें, कहीं ऐसा न हो कि मैं रूमी शत्रुओं की स्त्रियों को देखकर किसी गुनाह में पड़ जाऊँ। सुन लो! वास्तव में, वे जो दावा करते हैं उससे कहीं अधिक बड़े फ़ितने में पड़ चुके हैं, जो कि निफ़ाक़ का फ़ितना और युद्ध से पीछे रहने का फ़ितना है। निःसंदेह क़ियामत के दिन जहन्नम काफ़िरों को अवश्य घेरने वाली है। उनमें से कोई भी उससे बच नहीं सकता और न ही वे उससे भागने की कोई जगह पाएँगे।

50

إِن تُصِبْكَ حَسَنَةٌۭ تَسُؤْهُمْ ۖ وَإِن تُصِبْكَ مُصِيبَةٌۭ يَقُولُوا۟ قَدْ أَخَذْنَآ أَمْرَنَا مِن قَبْلُ وَيَتَوَلَّوا۟ وَّهُمْ فَرِحُونَ

तुमको कोई फायदा पहुंचा तो उन को बुरा मालूम होता है और अगर तुम पर कोई मुसीबत आ पड़ती तो ये लोग कहते हैं कि (इस वजह से) हमने अपना काम पहले ही ठीक कर लिया था और (ये कह कर) ख़ुश (तुम्हारे पास से उठकर) वापस लौटतें है

यदि (ऐ अल्लाह के रसूल!) आपको विजय या ग़नीमत के धन के रूप में अल्लाह की ओर से कोई आनंदकर नेमत प्राप्त होती है, तो वे उसे नापसंद करते हैं और उसके लिए शोक मनाते हैं। और यदि कठिनाई या दुश्मन की विजय के रूप में आपपर कोई विपत्ति आ पड़ती है, तो ये मुनाफ़िक़ लोग कहते हैं : हमने अपने लिए सावधानी बरती और हमने उस समय समझदारी (विवेक) से काम लिया जब हम लड़ाई के लिए नहीं निकले, जिस तरह कि ईमान वाले निकले थे। जिसके कारण उन्हें क़त्ल और क़ैद का सामना करना पड़ा। फिर ये मुनाफ़िक़ लोग अपनी सुरक्षा से खुश अपने परिवारों की ओर लौटते हैं।

Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.