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9. At-Tawba

The Repentance · Medinan · 129 ayahs

سُورَةُ التَّوۡبَةِ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 101–110 of 129

101

وَمِمَّنْ حَوْلَكُم مِّنَ ٱلْأَعْرَابِ مُنَٰفِقُونَ ۖ وَمِنْ أَهْلِ ٱلْمَدِينَةِ ۖ مَرَدُوا۟ عَلَى ٱلنِّفَاقِ لَا تَعْلَمُهُمْ ۖ نَحْنُ نَعْلَمُهُمْ ۚ سَنُعَذِّبُهُم مَّرَّتَيْنِ ثُمَّ يُرَدُّونَ إِلَىٰ عَذَابٍ عَظِيمٍۢ

और (मुसलमानों) तुम्हारे एतराफ़ (आस पास) के गॅवार देहातियों में से बाज़ मुनाफिक़ (भी) हैं और ख़ुद मदीने के रहने वालों मे से भी (बाज़ मुनाफिक़ हैं) जो निफ़ाक पर अड़ गए हैं (ऐ रसूल) तुम उन को नहीं जानते (मगर) हम उनको (ख़ूब) जानते हैं अनक़रीब हम (दुनिया में) उनकी दोहरी सज़ा करेगें फिर ये लोग (क़यामत में) एक बड़े अज़ाब की तरफ लौटाए जाऎंगे

देहात के वासियों में से जो लोग मदीना के आस-पास हैं, उनमें से कुछ लोग मुनाफ़िक़ हैं और मदीना वालों में से भी कुछ लोग मुनाफ़िक़ हैं, जो निफाक़ पर क़ायम और उसपर जमे हुए हैं। (ऐ रसूल!) आप उन्हें नहीं जानते, अल्लाह ही उन्हें भली-भाँति जानता है। शीघ्र ही अल्लाह उन्हें दो बार यातना देगा : एक बार दुनिया में उनके पाखंड को उजागर करके तथा उन्हें क़त्ल किए जाने और बंदी बनाए जाने के द्वारा, तथा दूसरी बार आख़िरत में क़ब्र की यातना देकर। फिर वे क़ियामत के दिन जहन्नम के पाताल में एक बड़ी यातना की ओर लौटाए जाएँगे।

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102

وَءَاخَرُونَ ٱعْتَرَفُوا۟ بِذُنُوبِهِمْ خَلَطُوا۟ عَمَلًۭا صَٰلِحًۭا وَءَاخَرَ سَيِّئًا عَسَى ٱللَّهُ أَن يَتُوبَ عَلَيْهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌ

और कुछ लोग हैं जिन्होंने अपने गुनाहों का (तो) एकरार किया (मगर) उन लोगों ने भले काम को और कुछ बुरे काम को मिला जुला (कर गोलमाल) कर दिया क़रीब है कि ख़ुदा उनकी तौबा कुबूल करे (क्योंकि) ख़ुदा तो यक़ीनी बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान हैं

तथा मदीना वालों में से कुछ अन्य लोग भी हैं, जो बिना किसी कारण (बहाने) के युद्ध से पीछे रह गए। लेकिन उन्होंने झूठे बहाने बनाने के बजाय, स्वयं स्वीकार कर लिया कि उनके पास (युद्ध में शामिल न होने का) कोई कारण (बहाना) नहीं था। उन्होंने अपने पिछले अच्छे कर्मों, जैसे अल्लाह की आज्ञाकारिता करने, उसके नियमों का पालन करने और उसके मार्ग में जिहाद करने के साथ एक बुरे काम को मिला दिया। उन्हें आशा है कि अल्लाह उनके पश्चाताप को स्वीकार करेगा और उन्हें क्षमा कर देगा। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदो को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।

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103

خُذْ مِنْ أَمْوَٰلِهِمْ صَدَقَةًۭ تُطَهِّرُهُمْ وَتُزَكِّيهِم بِهَا وَصَلِّ عَلَيْهِمْ ۖ إِنَّ صَلَوٰتَكَ سَكَنٌۭ لَّهُمْ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ

(ऐ रसूल) तुम उनके माल की ज़कात लो (और) इसकी बदौलत उनको (गुनाहो से) पाक साफ करों और उनके वास्ते दुआएं ख़ैर करो क्योंकि तुम्हारी दुआ इन लोगों के हक़ में इत्मेनान (का बाइस है) और ख़ुदा तो (सब कुछ) सुनता (और) जानता है

(ऐ रसूल!) आप उनके मालों में से ज़कात लें, जिसके द्वारा आप उन्हें अवज्ञा और पापों की गंदगी से शुद्ध करें और उसके साथ उनके अच्छे कर्मों को विकसित करें। तथा उसे उनसे लेने के बाद, उनके लिए दुआ करें। निःसंदेह आपकी दुआ उनके लिए दया और संतोष का कारण है। अल्लाह आपकी दुआ को सुनने वाला, उनके कार्यों और इरादों को जानने वाला है।

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104

أَلَمْ يَعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ هُوَ يَقْبَلُ ٱلتَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِۦ وَيَأْخُذُ ٱلصَّدَقَٰتِ وَأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ

क्या इन लोगों ने इतने भी नहीं जाना यक़ीनन ख़ुदा बन्दों की तौबा क़ुबूल करता है और वही ख़ैरातें (भी) लेता है और इसमें शक़ नहीं कि वही तौबा का बड़ा कुबूल करने वाला मेहरबान है

जिहाद से पीछे रह जाने वालों और पश्चाताप करके अल्लाह की ओर लौटने वालों को पता होना चाहिए कि अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों की तौबा क़बूल करता है, और यह कि वह दान को स्वीकार करता है, जबकि उसे उसकी कोई आवश्यकता नहीं है, तथा दान करने वाले को उसके दान का सवाब देता है। निःसंदेह पवित्र अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदो की तौबा क़बूल करने वाला, उनपर दया करने वाला है।

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105

وَقُلِ ٱعْمَلُوا۟ فَسَيَرَى ٱللَّهُ عَمَلَكُمْ وَرَسُولُهُۥ وَٱلْمُؤْمِنُونَ ۖ وَسَتُرَدُّونَ إِلَىٰ عَٰلِمِ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَٰدَةِ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ

और (ऐ रसूल) तुम कह दो कि तुम लोग अपने अपने काम किए जाओ अभी तो ख़ुदा और उसका रसूल और मोमिनीन तुम्हारे कामों को देखेगें और बहुत जल्द (क़यामत में) ज़ाहिर व बातिन के जानने वाले (ख़ुदा) की तरफ लौटाए जाऎंगे तब वह जो कुछ भी तुम करते थे तुम्हें बता देगा

तथा (ऐ रसूल!) आप इन जिहाद से पीछे रह जाने वालों और अपने पाप से तौबा करने वालों से कह दीजिए : जो चीज़ तुमसे छूट गई है, उसके नुक़सान की भरपाई करो, अपने कार्यों को अल्लाह के लिए ख़ालिस (विशुद्ध) रखो और उसे प्रसन्न करने वाले कार्य करो। अल्लाह, उसके रसूल और ईमान वाले तुम्हारे कार्यों को देखेंगे। तथा क़ियामत के दिन तुम अपने पालनहार की ओर लौटाए जाओगे, जो हर चीज़ का ज्ञान रखता है। वह जानता है जो कुछ तुम गुप्त रखते हो और जो कुछ तुम प्रदर्शित करते हो। फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुम दुनिया में किया करते थे और तुम्हें उसका बदला देगा।

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106

وَءَاخَرُونَ مُرْجَوْنَ لِأَمْرِ ٱللَّهِ إِمَّا يُعَذِّبُهُمْ وَإِمَّا يَتُوبُ عَلَيْهِمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ

और कुछ लोग हैं जो हुक्मे ख़ुदा के उम्मीदवार किए गए हैं (उसको अख्तेयार है) ख्वाह उन पर अज़ाब करे या उन पर मेहरबानी करे और ख़ुदा (तो) बड़ा वाकिफकार हिकमत वाला है

तबूक की लड़ाई से पीछे रहने वालों में से कुछ दूसरे लोग भी हैं, जिनके पास कोई बहाना नहीं था। इनका मामला अल्लाह का फ़ैसला और इनके बारे में उसका आदेश आने तक स्थगित कर दिया गया है। अल्लाह उनके बारे में जो चाहे, फैसला करे : या तो वह उन्हें दंडित करे यदि वे तौबा न करें, या उनकी तौबा स्वीकार करे अगर वे तौबा कर लें। अल्लाह अच्छी तरह जानता है कि कौन उसके दंड का हक़दार है और कौन उसकी क्षमा के योग्य है। वह अपने विधान और प्रबंधन में हिकमत वाला है। ये लोग : मुरारा बिन रबी', कअब बिन मालिक और हिलाल बिन उमैया थे।

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107

وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ مَسْجِدًۭا ضِرَارًۭا وَكُفْرًۭا وَتَفْرِيقًۢا بَيْنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَإِرْصَادًۭا لِّمَنْ حَارَبَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ مِن قَبْلُ ۚ وَلَيَحْلِفُنَّ إِنْ أَرَدْنَآ إِلَّا ٱلْحُسْنَىٰ ۖ وَٱللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَٰذِبُونَ

और (वह लोग भी मुनाफिक़ हैं) जिन्होने (मुसलमानों के) नुकसान पहुंचाने और कुफ़्र करने वाले और मोमिनीन के दरमियान तफरक़ा (फूट) डालते और उस शख़्स की घात में बैठने के वास्ते मस्जिद बनाकर खड़ी की है जो ख़ुदा और उसके रसूल से पहले लड़ चुका है (और लुत्फ़ तो ये है कि) ज़रूर क़समें खाएगें कि हमने भलाई के सिवा कुछ और इरादा ही नहीं किया और ख़ुदा ख़ुद गवाही देता है

तथा मुनाफ़िक़ो में से वे लोग भी हैं, जिन्होंने एक मस्जिद बनाई पर अल्लाह की आज्ञाकारिता के लिए नहीं, बल्कि मुसलमानों को नुक़सान पहुँचाने के लिए, मुनाफ़िक़ों को मज़बूत करके कुफ़्र का प्रदर्शन करने के लिए, ईमान वालों के बीच फूट डालने के लिए और उन लोगों को तैयारी का स्थान तथा घात स्थल प्रदान करने के लिए, जिन्होंने मस्जिद के निर्माण से पूर्व अल्लाह और उसके रसूल से लड़ाई की। निश्चय ये मुनाफ़िक़ तुमसे अवश्य ही क़समें खाकर कहेंगे : हमारा मक़सद तो केवल मुसलमानों के साथ आसानी (दयालुता) का था। जबकि अल्लाह गवाही देता है कि निश्चय वे अपने इस दावे में झूठे हैं।

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108

لَا تَقُمْ فِيهِ أَبَدًۭا ۚ لَّمَسْجِدٌ أُسِّسَ عَلَى ٱلتَّقْوَىٰ مِنْ أَوَّلِ يَوْمٍ أَحَقُّ أَن تَقُومَ فِيهِ ۚ فِيهِ رِجَالٌۭ يُحِبُّونَ أَن يَتَطَهَّرُوا۟ ۚ وَٱللَّهُ يُحِبُّ ٱلْمُطَّهِّرِينَ

ये लोग यक़ीनन झूठे है (ऐ रसूल) तुम इस (मस्जिद) में कभी खड़े भी न होना वह मस्जिद जिसकी बुनियाद अव्वल रोज़ से परहेज़गारी पर रखी गई है वह ज़रूर उसकी ज्यादा हक़दार है कि तुम उसमें खडे होकर (नमाज़ पढ़ो क्योंकि) उसमें वह लोग हैं जो पाक व पाकीज़ा रहने को पसन्द करते हैं और ख़ुदा भी पाक व पाकीज़ा रहने वालों को दोस्त रखता है

(ऐ नबी!) आप इस तरह की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए मुनाफ़िक़ों के आमंत्रण को स्वीकार न करें। क्योंकि क़ुबा की मस्जिद, जिसे शुरू ही से तक़्वा (धर्मपरायणता) पर स्थापित किया गया है, आपका उसमें नमाज़ पढ़ना इस मस्जिद की तुलना में अधिक उपयुक्त है, जिसे कुफ़्र पर स्थापित किया गया है। क़ुबा की मस्जिद में ऐसे लोग हैं, जो अशुद्धियों और गंदगियों से पानी के द्वारा और पापों से तौबा और क्षमायाचना के द्वारा शुद्ध रहना पसंद करते हैं, और अल्लाह अशुद्धताओं, गंदगियों और पापों से शुद्ध रहने वालों को पसंद करता है।

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109

أَفَمَنْ أَسَّسَ بُنْيَٰنَهُۥ عَلَىٰ تَقْوَىٰ مِنَ ٱللَّهِ وَرِضْوَٰنٍ خَيْرٌ أَم مَّنْ أَسَّسَ بُنْيَٰنَهُۥ عَلَىٰ شَفَا جُرُفٍ هَارٍۢ فَٱنْهَارَ بِهِۦ فِى نَارِ جَهَنَّمَ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّٰلِمِينَ

क्या जिस शख़्स ने ख़ुदा के ख़ौफ और ख़ुशनूदी पर अपनी इमारत की बुनियाद डाली हो वह ज्यादा अच्छा है या वह शख़्स जिसने अपनी इमारत की बुनियाद इस बोदे किनारे के लब पर रखी हो जिसमें दरार पड़ चुकी हो और अगर वह चाहता हो फिर उसे ले दे के जहन्नुम की आग में फट पडे और ख़ुदा ज़ालिम लोगों को मंज़िलें मक़सूद तक नहीं पहुंचाया करता

क्या जिसने अपने भवन की आधारशिला अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उसके तक़्वा तथा अधिक से अधिक नेकी के कार्य करके अल्लाह की प्रसन्नता पर रखी है, वह उसके बराबर है, जिसने मुसलमानों को नुक़सान पहुँचाने, कुफ़्र को मज़बूत करने और ईमान वालों के बीच विभेद पैदा करने के लिए मस्जिद बनाई?! दोनों कभी बराबर नहीं हो सकते। पहले व्यक्ति का भवन शक्तिशाली और मज़बूत है, जिसके गिरने का डर नहीं है। जबकि दूसरे व्यक्ति का उदाहरण उस व्यक्ति की तरह है, जिसने किसी गड्ढे के किनारे एक भवन बनाया, पर वह ढह गया और गिर गया और उसके साथ ही उसका भवन जहन्नम की गहराई में जा गिरा। सच्चाई यह है कि अल्लाह कुफ़्र और निफ़ाक़ वग़ैरह के ज़रिए अत्याचार करने वाले लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता।

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110

لَا يَزَالُ بُنْيَٰنُهُمُ ٱلَّذِى بَنَوْا۟ رِيبَةًۭ فِى قُلُوبِهِمْ إِلَّآ أَن تَقَطَّعَ قُلُوبُهُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ

(ये इमारत की) बुनियाद जो उन लोगों ने क़ायम की उसके सबब से उनके दिलो में हमेशा धरपकड़ रहेगी यहाँ तक कि उनके दिलों के परख़चे उड़ जाएँ और ख़ुदा तो बड़ा वाक़िफकार हकीम हैं

उनकी यह मस्जिद, जिसे उन्होंने (मुसलमानों को) नुक़सान पहुँचाने के लिए बनाया है, सदा उनके दिलों में संदेह और निफ़ाक़ के रूप में बसी रहेगी, यहाँ तक कि मौत से अथवा तलवार के द्वारा वध से उनके दिल टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ। अल्लाह अपने बंदों के कामों को जानने वाला, उनके अच्छे या बुरे कर्म का बदला देने में हिकमत वाला है।

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Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.