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7. Al-A'raaf

The Heights · Meccan · 206 ayahs

سُورَةُ الأَعۡرَافِ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 91–100 of 206

91

فَأَخَذَتْهُمُ ٱلرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا۟ فِى دَارِهِمْ جَٰثِمِينَ

ग़रज़ उन लोगों को ज़लज़ले ने ले डाला बस तो वह अपने घरों में औन्धे पड़े रह गए

चुनाँचे उन्हें भयंकर भूकंप ने पकड़ लिया, तो वे अपने घरों में विनष्ट हो गए, इस हाल में कि अपने घुटनों और चेहरों के बल अपने घरों में मृत और बेजान पड़े हुए थे।

Al-A'raaf 7:91Listen in Qur'an →
92

ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ شُعَيْبًۭا كَأَن لَّمْ يَغْنَوْا۟ فِيهَا ۚ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ شُعَيْبًۭا كَانُوا۟ هُمُ ٱلْخَٰسِرِينَ

जिन लोगों ने शुएब को झुठलाया था वह (ऐसे मर मिटे कि) गोया उन बस्तियों में कभी आबाद ही न थे जिन लोगों ने शुएब को झुठलाया वही लोग घाटे में रहे

जिन लोगों ने शुऐब अलैहिस्सलाम को झुठलाया, वे सब के सब विनष्ट हो गए, और वे ऐसे हो गए जैसे वे अपने घरों में बसे ही न थे और उन्होंने इसका आनंद ही नहीं लिया था। जिन लोगों ने शुऐब अलैहिस्सलाम को झुठलाया, वही लोग घाटे में रहे; इसलिए कि उन्होंने अपना और अपनी धन-संपत्ति का विनाश किया। जबकि उनकी जाति के मोमिनों का कोई घाटा नहीं हुआ, जैसा कि इन झुठलाने वाले काफ़िरों ने दावा किया था।

Al-A'raaf 7:92Listen in Qur'an →
93

فَتَوَلَّىٰ عَنْهُمْ وَقَالَ يَٰقَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسَٰلَٰتِ رَبِّى وَنَصَحْتُ لَكُمْ ۖ فَكَيْفَ ءَاسَىٰ عَلَىٰ قَوْمٍۢ كَٰفِرِينَ

तब शुएब उन लोगों के सर से टल गए और (उनसे मुख़ातिब हो के) कहा ऐ मेरी क़ौम मैं ने तो अपने परवरदिगार के पैग़ाम तुम तक पहुँचा दिए और तुम्हारी ख़ैर ख्वाही की थी, फिर अब मैं काफिरों पर क्यों कर अफसोस करूँ

जब उनका विनाश हो गया, तो उनके पैगंबर शुऐब अलैहिस्सलाम उनसे विमुख हो गए और उन्हें संबोधित करते हुए बोले : ऐ मेरी जाति के लोगो! मैंने तुम्हें वह संदेश पहुँचा दिया था जिसका मेरे पालनहार ने मुझे तुमको पहुँचाने का आदेश दिया था, तथा मैं तुम्हारा हितैषी व शुभ चिंतक बना रहा, किंतु तुमने मेरी ख़ैर-ख़्वाही (शुभचिंतन) को स्वीकार नहीं किया और मेरे मार्गदर्शन पर चलने को तैयार न हुए। तो भला मैं ऐसे लोगों पर शोक कैसे करूँ, जो अल्लाह के साथ कुफ़्र करने वाले हैं और अपने कुफ़्र पर अडिग हैं?

Al-A'raaf 7:93Listen in Qur'an →
94

وَمَآ أَرْسَلْنَا فِى قَرْيَةٍۢ مِّن نَّبِىٍّ إِلَّآ أَخَذْنَآ أَهْلَهَا بِٱلْبَأْسَآءِ وَٱلضَّرَّآءِ لَعَلَّهُمْ يَضَّرَّعُونَ

और हमने किसी बस्ती में कोई नबी नही भेजा मगर वहाँ के रहने वालों को (कहना न मानने पर) सख्ती और मुसीबत में मुब्तिला किया ताकि वह लोग (हमारी बारगाह में) गिड़गिड़ाए

तथा हमने किसी बस्ती में अपना जो भी रसूल भेजा, फिर उसके वासियों ने नबी को झुठला दिया और कुफ्र का मार्ग अपनाया, तो हमने उन्हें कठिनाई, ग़रीबी और बीमारी से पीड़ित कर दिया, ताकि वे अल्लाह के सामने अपनी विनम्रता प्रकट करें। जिसके परिणामस्वरूप वे अपने कुफ़्र और अहंकार को छोड़ दें। यह झुठलाने वाले समुदायों के बारे में अल्लाह की परंपरा का उल्लेख करके क़ुरैश के लिए तथा सभी इनकार करने और झुठलाने वालों के लिए एक चेतावनी है।

Al-A'raaf 7:94Listen in Qur'an →
95

ثُمَّ بَدَّلْنَا مَكَانَ ٱلسَّيِّئَةِ ٱلْحَسَنَةَ حَتَّىٰ عَفَوا۟ وَّقَالُوا۟ قَدْ مَسَّ ءَابَآءَنَا ٱلضَّرَّآءُ وَٱلسَّرَّآءُ فَأَخَذْنَٰهُم بَغْتَةًۭ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ

फिर हमने तकलीफ़ की जगह आराम को बदल दिया यहाँ तक कि वह लोग बढ़ निकले और कहने लगे कि इस तरह की तकलीफ़ व आराम तो हमारे बाप दादाओं को पहुँच चुका है तब हमने (उस बढ़ाने के की सज़ा में (अचानक उनको अज़ाब में) गिरफ्तार किया

फिर हमने तंगी और बीमारी से ग्रस्त करने के बाद उन्हें अच्छाई, विस्तार और सुरक्षा प्रदान की, यहाँ तक कि उनकी संख्या अधिक हो गई तथा उनकी धन-संपत्ति में वृद्धि हो गई और वे कहने लगे : हमें जो बुराई और अच्छाई पहुँची है, वह एक नियमित आदत है, जो पहले हमारे पूर्वजों को भी पहुँच चुकी है। उन्हें इस बात का एहसास नहीं हुआ कि वे जिस दुर्दशा से पीड़ित हुए थे, उससे उन्हें सीख लेना चाहिए था, तथा उन्हें जो नेमतें प्राप्त हुई थीं, उनका उद्देश्य ढील देना था। अतः हमने अचानक उन्हें यातना द्वारा पकड़ लिया और उन्हें यातना का एहसास भी नहीं हुआ और न ही वे इसकी कल्पना करते थे।

Al-A'raaf 7:95Listen in Qur'an →
96

وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ ٱلْقُرَىٰٓ ءَامَنُوا۟ وَٱتَّقَوْا۟ لَفَتَحْنَا عَلَيْهِم بَرَكَٰتٍۢ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ وَلَٰكِن كَذَّبُوا۟ فَأَخَذْنَٰهُم بِمَا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ

और वह बिल्कुल बेख़बर थे और अगर उन बस्तियों के रहने वाले ईमान लाते और परहेज़गार बनते तो हम उन पर आसमान व ज़मीन की बरकतों (के दरवाजे) ख़ोल देते मगर (अफसोस) उन लोगों ने (हमारे पैग़म्बरों को) झूठलाया तो हमने भी उनके करतूतों की बदौलत उन को (अज़ाब में) गिरफ्तार किया

और यदि इन बस्तियों के वासी, जिनकी ओर हमने अपने रसूलों को भेजा था, उन बातों पर विश्वास करते जो उनके रसूल उनके पास लेकर आए थे, तथा अपने पालनहार से, कुफ़्र और गुनाहों को छोड़कर और उसके आदेशों का पालन करके, डरते, तो हम उनके लिए चारों ओर से भलाई के द्वार खोल देते, लेकिन उन्होंने न तो विश्वास किया और न डरे, बल्कि अपने रसूलों के लाए हुए संदेश को झुठलाया। अतः हमने उन्हें उनके किए हुए गुनाहों और पापों के कारण अचानक यातना से ग्रस्त कर दिया।

Al-A'raaf 7:96Listen in Qur'an →
97

أَفَأَمِنَ أَهْلُ ٱلْقُرَىٰٓ أَن يَأْتِيَهُم بَأْسُنَا بَيَٰتًۭا وَهُمْ نَآئِمُونَ

(उन) बस्तियों के रहने वाले उस बात से बेख़ौफ हैं कि उन पर हमारा अज़ाब रातों रात आ जाए जब कि वह पड़े बेख़बर सोते हों

तो क्या इन झुठलाने वाली बस्तियों के लोग इस बात से निश्चिंत हो गए हैं कि उनपर हमारी यातना रात के समय आ जाए और वे अपने आराम और शांति में लीन होकर सो रहे हैं?

Al-A'raaf 7:97Listen in Qur'an →
98

أَوَأَمِنَ أَهْلُ ٱلْقُرَىٰٓ أَن يَأْتِيَهُم بَأْسُنَا ضُحًۭى وَهُمْ يَلْعَبُونَ

या उन बस्तियों वाले इससे बेख़ौफ हैं कि उन पर दिन दहाड़े हमारा अज़ाब आ पहुँचे जब वह खेल कूद (में मशग़ूल हो)

और क्या वे इस बात से निश्चिंत हो गए हैं कि उनपर हमारी यातना दिन की शुरुआत में आ जाए और वे अपनी दुनिया में व्यस्त होने की वजह से बेपरवाह और ग़ाफ़िल हों?!

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99

أَفَأَمِنُوا۟ مَكْرَ ٱللَّهِ ۚ فَلَا يَأْمَنُ مَكْرَ ٱللَّهِ إِلَّا ٱلْقَوْمُ ٱلْخَٰسِرُونَ

तो क्या ये लोग ख़ुदा की तद्बीर से ढीट हो गए हैं तो (याद रहे कि) ख़ुदा के दॉव से घाटा उठाने वाले ही निडर हो बैठे हैं

देखो, अल्लाह ने उन्हे किस क़दर मोहलत दी है, और ढील देते हुए शक्ति तथा विस्तृत जीविका प्रदान की है; तो क्या इन नगरों के ये झुठलनाने वाले लोग अल्लाह की चाल और उसके गुप्त उपाय से निश्चिंत हो गए हैं? तो (याद रखो!) अल्लाह के गुप्त उपाय से निश्चिंत केवल वही लोग होते हैं, जिनके भाग्य में विनाश लिखा हो। रही बात तौफ़ीक़ वाले लोगों की, तो वे उसके गुप्त उपाय से डरते हैं। यही कारण है कि उसकी नेमतों से धोखा नहीं खाते, बल्कि उसके एहसान के आभारी रहते हैं और उसका शुक्रिया अदा करते हैं।

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100

أَوَلَمْ يَهْدِ لِلَّذِينَ يَرِثُونَ ٱلْأَرْضَ مِنۢ بَعْدِ أَهْلِهَآ أَن لَّوْ نَشَآءُ أَصَبْنَٰهُم بِذُنُوبِهِمْ ۚ وَنَطْبَعُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ

क्या जो लोग अहले ज़मीन के बाद ज़मीन के वारिस (व मालिक) होते हैं उन्हें ये मालूम नहीं कि अगर हम चाहते तो उनके गुनाहों की बदौलत उनको मुसीबत में फँसा देते (मगर ये लोग ऐसे नासमझ हैं कि गोया) उनके दिलों पर हम ख़ुद (मोहर कर देते हैं कि ये लोग कुछ सुनते ही नहीं

तो क्या उन लोगों के सामने यह तथ्य स्पष्ट नहीं हुआ, जो अपने पूर्वजों के बाद धरती के वारिस हुए, जिन्हें उनके गुनाहों के कारण विनष्ट कर दिया गया था, फिर उन्होंने उनपर उतरने वाली यातना से शिक्षा ग्रहण नहीं की, बल्कि उन्हीं जैसे कर्म करते रहे। क्या इन लोगों के सामने यह तथ्य स्पष्ट नहीं हुआ कि अगर अल्लाह उन्हें उनके गुनाहों के कारण पकड़ना चाहे, तो अपनी रीति के अनुसार पकड़ ले और उनके दिलों पर मुहर लगा दे, फिर उन्हें न किसी उपदेश से लाभ हो, न किसी याद-दहानी से फ़ायदा?!

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Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.