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7. Al-A'raaf

The Heights · Meccan · 206 ayahs

سُورَةُ الأَعۡرَافِ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 1–10 of 206

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

1

الٓمٓصٓ

अलिफ़ लाम मीम स्वाद

(अलिफ़, लाम, मीम, साद) सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।

2

كِتَٰبٌ أُنزِلَ إِلَيْكَ فَلَا يَكُن فِى صَدْرِكَ حَرَجٌۭ مِّنْهُ لِتُنذِرَ بِهِۦ وَذِكْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ

(ऐ रसूल) ये किताब ख़ुदा (क़ुरान) तुम पर इस ग़रज़ से नाज़िल की गई है ताकि तुम उसके ज़रिये से लोगों को अज़ाबे ख़ुदा से डराओ और ईमानदारों के लिए नसीहत का बायस हो

क़ुरआन-ए-करीम एक पुस्तक है, जिसे अल्लाह ने (ऐ रसूल!) आपपर उतारा है। अतः आपके सीने में उसके संबंध में कोई तंगी या संदेह न हो। अल्लाह ने इसे आपकी ओर इसलिए अवतरित किया है, ताकि आप उसके द्वारा लोगों को डराएँ और तर्क स्थापित करें, तथा उसके द्वारा ईमान वालों को नसीहत करें। क्योंकि वही लोग नसीहत से लाभान्वित होते हैं।

3

ٱتَّبِعُوا۟ مَآ أُنزِلَ إِلَيْكُم مِّن رَّبِّكُمْ وَلَا تَتَّبِعُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ أَوْلِيَآءَ ۗ قَلِيلًۭا مَّا تَذَكَّرُونَ

तुम्हारे दिल में उसकी वजह से कोई न तंगी पैदा हो (लोगों) जो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम पर नाज़िल किया गया है उसकी पैरवी करो और उसके सिवा दूसरे (फर्ज़ी) बुतों (माबुदों) की पैरवी न करो

(ऐ लोगो!) उस किताब का अनुसरण करो, जो तुम्हारे पालनहार ने तुमपर उतारी है, तथा अपने नबी की सुन्नत का पालन करो, और उन शैतानों या दुष्ट रब्बियों की इच्छाओं का पालन न करो, जिन्हें तुम अपने संरक्षक समझते हो, उनकी इच्छाएँ जो कुछ निर्देशित करती हैं उसकी ख़ातिर तुम उसे छोड़कर, जो तुमपर उतारा गया है, उनसे दोस्ती करते हो। दरअसल, तुम बहुत ही कम शिक्षा ग्रहण करते हो; क्योंकि यदि तुम शिक्षा ग्रहण करते, तो तुम सत्य पर उसके अलावा को तरजीह न देते, और अवश्य तुम उसका अनुसरण करते जो तुम्हारे रसूल लेकर आए हैं, तथा उसपर अमल करते और उसके सिवा अन्य चीज़ों को छोड़ देते।

4

وَكَم مِّن قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَٰهَا فَجَآءَهَا بَأْسُنَا بَيَٰتًا أَوْ هُمْ قَآئِلُونَ

तुम लोग बहुत ही कम नसीहत क़ुबूल करते हो और क्या (तुम्हें) ख़बर नहीं कि ऐसी बहुत सी बस्तियाँ हैं जिन्हें हमने हलाक कर डाला तो हमारा अज़ाब (ऐसे वक्त) आ पहुचा

कितनी ही बस्तियाँ ऐसी हैं, जिन्हें हमने अपने अज़ाब से विनष्ट कर दिया, जब वे अपने इनकार तथा गुमराही पर अडिग रहीं। चुनाँचे उनपर हमारा गंभीर अज़ाब रात या दिन में उनकी ग़फ़लत के समय आ पहुँचा। फिर वे अपने आपसे अज़ाब को नहीं हटा सके, और न ही उसे उनसे उनके तथाकथित पूज्यों ने हटाया।

5

فَمَا كَانَ دَعْوَىٰهُمْ إِذْ جَآءَهُم بَأْسُنَآ إِلَّآ أَن قَالُوٓا۟ إِنَّا كُنَّا ظَٰلِمِينَ

कि वह लोग या तो रात की नींद सो रहे थे या दिन को क़लीला (खाने के बाद का लेटना) कर रहे थे तब हमारा अज़ाब उन पर आ पड़ा तो उनसे सिवाए इसके और कुछ न कहते बन पड़ा कि हम बेशक ज़ालिम थे

फिर यातना के उतर जाने के बाद उनसे इसके सिवा कुछ न बन पड़ा कि उन्होंने अल्लाह का इनकार करके अपने ऊपर अत्याचार करने के अपराध को स्वीकार कर लिया।

6

فَلَنَسْـَٔلَنَّ ٱلَّذِينَ أُرْسِلَ إِلَيْهِمْ وَلَنَسْـَٔلَنَّ ٱلْمُرْسَلِينَ

फिर हमने तो ज़रूर उन लोगों से जिनकी तरफ पैग़म्बर भेजे गये थे (हर चीज़ का) सवाल करेगें और ख़ुद पैग़म्बरों से भी ज़रूर पूछेगें

हम क़ियामत के दिन उन समुदायों से अवश्य पूछेंगे, जिनकी ओर हमने अपने रसूल भेजे थे कि उन्होंने रसूलों को क्या जवाब दिया, तथा हम उन रसूलों से भी उस संदेश को पहुँचाने के बारे में अवश्य पूछेंगे जिसके पहुँचाने का उन्हें आदेश दिया गया था, और इस बारे में कि उनके समुदायों ने उन्हें क्या जवाब दिया।

7

فَلَنَقُصَّنَّ عَلَيْهِم بِعِلْمٍۢ ۖ وَمَا كُنَّا غَآئِبِينَ

फिर हम उनसे हक़ीक़त हाल ख़ूब समझ बूझ के (ज़रा ज़रा) दोहराएगें

फिर हम समस्त लोगों के सामने अपने पूर्ण ज्ञान के साथ उनके उन कामों का वर्णन करेंगे जो उन्होंने इस संसार में किए थे। क्योंकि हम उनके सब कामों से अवगत थे, उनमें से कोई भी चीज़ हमसे ओझल नहीं थी, तथा हम किसी भी समय उनसे ग़ायब नहीं थे।

8

وَٱلْوَزْنُ يَوْمَئِذٍ ٱلْحَقُّ ۚ فَمَن ثَقُلَتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ

और हम कुछ ग़ायब तो थे नहीं और उस दिन (आमाल का) तौला जाना बिल्कुल ठीक है फिर तो जिनके (नेक अमाल के) पल्ले भारी होगें तो वही लोग फायज़ुलहराम (नजात पाये हुए) होगें

तथा क़ियामत के दिन कर्मों को न्याय (इंसाफ़) के साथ तौला जाएगा, जिसके साथ कोई अन्याय या अत्याचार नहीं होगा। फिर जिसकी नेकियों का पलड़ा उसके पापों के पलड़े से भारी हो गया, तो वही वे लोग हैं जो अपनी वांछित चीज़ को प्राप्त करने में सफल हो गए और उस चीज़ से बच गए जिसका उन्हें भय था।

9

وَمَنْ خَفَّتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُم بِمَا كَانُوا۟ بِـَٔايَٰتِنَا يَظْلِمُونَ

(और जिनके नेक अमाल के) पल्ले हलके होगें तो उन्हीं लोगों ने हमारी आयत से नाफरमानी करने की वजह से यक़ीनन अपना आप नुक़सान किया

तथा जिसके पापों का पलड़ा उसकी नेकियों के पलड़े से भारी हो गया, तो यही लोग हैं जिन्होंने, अल्लाह की आयतों का इनकार करने के कारण, क़ियामत के दिन अपने आपको विनाश के घाट उतार कर खुद को घाटे में डाल दिया।

10

وَلَقَدْ مَكَّنَّٰكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَجَعَلْنَا لَكُمْ فِيهَا مَعَٰيِشَ ۗ قَلِيلًۭا مَّا تَشْكُرُونَ

और (ऐ बनीआदम) हमने तो यक़ीनन तुमको ज़मीन में क़ुदरत व इख़तेदार दिया और उसमें तुम्हारे लिए असबाब ज़िन्दगी मुहय्या किए (मगर) तुम बहुत ही कम शुक्र करते हो

(ऐ आदम की औलाद!) हमने धरती में तुम्हें अधिकार दिया और उसमें तुम्हारे लिए जीने के साधन बनाए। इसलिए तुम्हें इसपर अल्लाह का शुक्रिया अदा करना चाहिए था, लेकिन तुम बहुत कम शुक्र करते हो।

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