۞ وَلَوْ أَنَّنَا نَزَّلْنَآ إِلَيْهِمُ ٱلْمَلَٰٓئِكَةَ وَكَلَّمَهُمُ ٱلْمَوْتَىٰ وَحَشَرْنَا عَلَيْهِمْ كُلَّ شَىْءٍۢ قُبُلًۭا مَّا كَانُوا۟ لِيُؤْمِنُوٓا۟ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ يَجْهَلُونَ
और (ऐ रसूल सच तो ये है कि) हम अगर उनके पास फरिश्ते भी नाज़िल करते और उनसे मुर्दे भी बातें करने लगते और तमाम (मख़फ़ी(छुपी)) चीज़ें (जैसे जन्नत व नार वग़ैरह) अगर वह गिरोह उनके सामने ला खड़े करते तो भी ये ईमान लाने वाले न थे मगर जब अल्लाह चाहे लेकिन उनमें के अक्सर नहीं जानते
यदि हम उन्हें जवाब देते हुए उनकी प्रस्तावित चीज़ को ले आते, चुनाँचे हम उनके पास फ़रिश्ते उतार देते और वे उन्हें अपनी आँखों से देख लेते, तथा मरे हुए लोग उनसे बातें करते और आप जो कुछ लेकर आए हैं उसमें उन्हें आपकी सच्चाई की ख़बर देते, एवं हम उनके लिए वह सब कुछ इकट्ठा कर देते, जो उन्होंने सुझाव दिया था, जिन्हें वे आमने-सामने देख लेते; तो भी वे उस चीज़ पर ईमान न लाते जो आप लेकर आए हैं, परंतु यह कि अल्लाह उनमें से जिसे मार्गदर्शन दिखाना चाहे। लेकिन उनमें से अधिकतर लोग इस बात से अनजान हैं। इसलिए वे अल्लाह का सहारा नहीं लेते ताकि वह उन्हें मार्गदर्शन का सामर्थ्य प्रदान करे।