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3. Aal-i-Imraan

The Family of Imraan · Medinan · 200 ayahs

سُورَةُ آلِ عِمۡرَانَ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 121–130 of 200

121

وَإِذْ غَدَوْتَ مِنْ أَهْلِكَ تُبَوِّئُ ٱلْمُؤْمِنِينَ مَقَٰعِدَ لِلْقِتَالِ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ

और (ऐ रसूल) एक वक्त वो भी था जब तुम अपने बाल बच्चों से तड़के ही निकल खड़े हुए और मोमिनीन को लड़ाई के मोर्चों पर बिठा रहे थे और खुदा सब कुछ जानता और सुनता है

तथा (ऐ नबी) आप उस समय को याद कीजिए, जब आप मदीना से, उहुद के मैदान में, मुश्रिकों से युद्ध के लिए निकल पड़े, जहाँ आपने ईमान वालों को उनके युद्ध के स्थानों पर नियुक्त करना आरंभ किया। चुनांचे आपने प्रत्येक व्यक्ति को उसका स्थान बताया। और अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे कामों को जानने वाला है।

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122

إِذْ هَمَّت طَّآئِفَتَانِ مِنكُمْ أَن تَفْشَلَا وَٱللَّهُ وَلِيُّهُمَا ۗ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ ٱلْمُؤْمِنُونَ

ये उस वक्त क़ा वाक़या है जब तुममें से दो गिरोहों ने ठान लिया था कि पसपाई करें और फिर (सॅभल गए) क्योंकि ख़ुदा तो उनका सरपरस्त था और मोमिनीन को ख़ुदा ही पर भरोसा रखना चाहिये

(ऐ नबी) याद कीजिए जो कुछ विश्वासियों के दो समूहों बनू सलिमा और बनू हारिसा के साथ घटित हुआ, जिस समय वे साहसहीन हो गए और मुनाफिक़ों (पाखंडियों) के वापस आने पर वापसी का इरादा कर लिया, हालाँकि अल्लाह उन्हें लड़ाई पर सुदृढ़ रखकर तथा उन्हें उनके उस इरादे से फेरकर उनकी सहायता करने वाला है। और मोमिनों को अपनी सभी स्थितियों में अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।

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123

وَلَقَدْ نَصَرَكُمُ ٱللَّهُ بِبَدْرٍۢ وَأَنتُمْ أَذِلَّةٌۭ ۖ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ

यक़ीनन ख़ुदा ने जंगे बदर में तुम्हारी मदद की (बावजूद के) तुम (दुश्मन के मुक़ाबले में) बिल्कुल बे हक़ीक़त थे (फिर भी) ख़ुदा ने फतेह दी

और अल्लाह बद्र के युद्ध में बहुदेववादियों के विरुद्ध तुम्हारी सहायता कर चुका है, जबकि तुम अपनी संख्या और उपकरणों की कमी के कारण कमज़ोर थे। अतः अल्लाह से डरो, ताकि तुम अपने ऊपर उसकी नेमतों के लिए आभारी हो सको।

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124

إِذْ تَقُولُ لِلْمُؤْمِنِينَ أَلَن يَكْفِيَكُمْ أَن يُمِدَّكُمْ رَبُّكُم بِثَلَٰثَةِ ءَالَٰفٍۢ مِّنَ ٱلْمَلَٰٓئِكَةِ مُنزَلِينَ

पस तुम ख़ुदा से डरते रहो ताकि (उनके) शुक्रगुज़ार बनो (ऐ रसूल) उस वक्त तुम मोमिनीन से कह रहे थे कि क्या तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं है कि तुम्हारा परवरदिगार तीन हज़ार फ़रिश्ते आसमान से भेजकर तुम्हारी मदद करे हॉ (ज़रूर काफ़ी है)

(ऐ नबी) उस समय को याद कीजिए, जब विश्वासियों के बहुदेववादियों के लिए आने वाली सहायता के बारे में सुनने के बाद आपने उन्हें बद्र की लड़ाई में साहस दिलाते हुए उनसे कहा : क्या तुम्हारे लिए यह पर्याप्त नहीं होगा कि अल्लाह तुम्हें लड़ाई में मजबूत करने के लिए अपनी ओर से उतारे हुऐ तीन हज़ार फरिश्तों के द्वारा तुम्हारी सहायता करे?!

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125

بَلَىٰٓ ۚ إِن تَصْبِرُوا۟ وَتَتَّقُوا۟ وَيَأْتُوكُم مِّن فَوْرِهِمْ هَٰذَا يُمْدِدْكُمْ رَبُّكُم بِخَمْسَةِ ءَالَٰفٍۢ مِّنَ ٱلْمَلَٰٓئِكَةِ مُسَوِّمِينَ

बल्कि अगर तुम साबित क़दम रहो और (रसूल की मुख़ालेफ़त से) बचो और कुफ्फ़ार अपने (जोश में) तुमपर चढ़ भी आये तो तुम्हारा परवरदिगार ऐसे पॉच हज़ार फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करेगा जो निशाने जंग लगाए हुए डटे होंगे और ख़ुदा ने ये मदद सिर्फ तुम्हारी ख़ुशी के लिए की है

हाँ (क्यों नहीं), तुम्हारे लिए इतना ही काफी है। जबकि तुम्हारे लिए अल्लाह की ओर से एक अन्य मदद की शुभ सूचना है : यदि तुम लड़ाई में धैर्य से काम लो और अल्लाह से डरते रहो, और तुम्हारे दुश्मनों को त्वरित मदद मिल जाए और वे तुमपर चढ़ दौड़ें, यदि ऐसा होता है, तो तुम्हरा पालनहार पाँच हज़ार फरिश्तों के द्वारा तुम्हारी सहायता करेगा, जो स्वयं को और अपने घोड़ों को स्पष्ट निशान के साथ चिह्नित किए होंगे।

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126

وَمَا جَعَلَهُ ٱللَّهُ إِلَّا بُشْرَىٰ لَكُمْ وَلِتَطْمَئِنَّ قُلُوبُكُم بِهِۦ ۗ وَمَا ٱلنَّصْرُ إِلَّا مِنْ عِندِ ٱللَّهِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَكِيمِ

और ताकि इससे तुम्हारे दिल की ढारस हो और (ये तो ज़ाहिर है कि) मदद जब होती है तो ख़ुदा ही की तरफ़ से जो सब पर ग़ालिब (और) हिकमत वाला है

और अल्लाह ने फरिश्तों के द्वारा इस सहायता और इस आपूर्ति को केवल तुम्हारे लिए एक शुभ सूचना बनाया है, जिससे तुम्हारे दिलों को आश्वासन हो जाए। अन्यथा, वास्तव में सहायता मात्र इन ज़ाहिरी कारणों से नहीं होती, बल्कि वास्तविक सहायता उस प्रभुत्वशाली अल्लाह की ओर से आती है, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता, और जो अपने आकलन व अनुमान और अपने विधान में हिकमत वाला (तत्वदर्शी) है।

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127

لِيَقْطَعَ طَرَفًۭا مِّنَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَوْ يَكْبِتَهُمْ فَيَنقَلِبُوا۟ خَآئِبِينَ

(और यह मदद की भी तो) इसलिए कि काफ़िरों के एक गिरोह को कम कर दे या ऐसा चौपट कर दे कि (अपना सा) मुंह लेकर नामुराद अपने घर वापस चले जायें

यह मदद (जीत) जो तुम्हें बद्र की लड़ाई में प्राप्त हुई है, उससे अल्लाह का उद्देश्य यह था कि काफ़िरों के एक समूह को हत्या कर नष्ट कर दे और दूसरे समूह को अपमानित कर दे तथा उनकी पराजय से उन्हें क्रोधित कर दे, फिर वे विफलता और अपमान के साथ लौटें।

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128

لَيْسَ لَكَ مِنَ ٱلْأَمْرِ شَىْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَٰلِمُونَ

(ऐ रसूल) तुम्हारा तो इसमें कुछ बस नहीं चाहे ख़ुदा उनकी तौबा कुबूल करे या उनको सज़ा दे क्योंकि वह ज़ालिम तो ज़रूर हैं

उहुद की लड़ाई में बहुदेववादियों की ओर से जो कुछ अत्याचार हुआ उसके बाद जब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें विनाश का शाप दिया, तो अल्लाह ने आपसे फरमाया : उनके मामले में आपको कोई अधिकार नहीं, बल्कि सारा मामला अल्लाह के हाथ में है। अतः आप धैर्य रखें यहाँ तक कि अल्लाह तुम्हारे बीच फैसला कर दे, या उन्हें तौबा की तौफ़ीक प्रदान कर दे और वे इस्लाम ग्रहण करलें, या वे निरंतर अपने कुफ्र (अविश्वास) ही पर बने रहें तो अल्लाह उन्हें यातना से पीड़ित करे, क्योंकि वे यातना के पात्र हैं।

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129

وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَآءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ

और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है सब ख़ुदा ही का है जिसको चाहे बख्शे और जिसको चाहे सज़ा करे और ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबार है

जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है, सब अल्लाह का है, रचना की दृष्टि से भी और प्रबंधन की दृष्टि से भी है। वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, अपनी दया से क्षमा कर देता है, और जिसे चाहता है अपने न्याय से सज़ा देता है। और अल्लाह अपने तौबा (पश्चाताप) करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।

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130

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَأْكُلُوا۟ ٱلرِّبَوٰٓا۟ أَضْعَٰفًۭا مُّضَٰعَفَةًۭ ۖ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ

ऐ ईमानदारों सूद दनादन खाते न चले जाओ और ख़ुदा से डरो कि तुम छुटकारा पाओ

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! अपने मूल धन जो तुमने उधार दिए थे, उस पर कई गुणा बढ़ाकर ब्याज लेने से बचो, जैसा कि जाहिलियत (अज्ञानता) काल के लोग किया करते थे। और अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से बचकर उससे डरो, ताकि तुम दुनिया और आख़िरत की जो भलाई चाहते हो, उसे प्राप्त कर सको।

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Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.