لَن يَضُرُّوكُمْ إِلَّآ أَذًۭى ۖ وَإِن يُقَٰتِلُوكُمْ يُوَلُّوكُمُ ٱلْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ
(मुसलमानों) ये लोग मामूली अज़ीयत के सिवा तुम्हें हरगिज़ ज़रर नहीं पहुंचा सकते और अगर तुमसे लड़ेंगे तो उन्हें तुम्हारी तरफ़ पीठ ही करनी होगी और फिर उनकी कहीं से मदद भी नहीं पहुंचेगी
वे चाहे जितनी भी दुश्मनी कर लें, वे तुम्हें - ऐ ईमान वालो - तुम्हारे धर्म तथा तुम्हारी जानों के संबंध में कोई हानि नहीं पहुँचा सकते। वे केवल अपनी ज़बान से धर्म पर दोषारोपण करके तथा तुम्हारा मज़ाक उड़ाकर, तुम्हें कष्ट दे सकते हैं। यदि वे तुम्हारे साथ युद्ध करें, तो तुम्हारे सामने पराजित होकर भाग खड़े होंगे और तुम्हारे विरुद्ध उनकी कभी भी सहायता नहीं की जाएगी।