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3. Aal-i-Imraan

The Family of Imraan · Medinan · 200 ayahs

سُورَةُ آلِ عِمۡرَانَ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 101–110 of 200

101

وَكَيْفَ تَكْفُرُونَ وَأَنتُمْ تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ ءَايَٰتُ ٱللَّهِ وَفِيكُمْ رَسُولُهُۥ ۗ وَمَن يَعْتَصِم بِٱللَّهِ فَقَدْ هُدِىَ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ

और (भला) तुम क्योंकर काफ़िर बन जाओगे हालॉकि तुम्हारे सामने ख़ुदा की आयतें (बराबर) पढ़ी जाती हैं और उसके रसूल (मोहम्मद) भी तुममें (मौजूद) हैं और जो शख्स ख़ुदा से वाबस्ता हो वह (तो) जरूर सीधी राह पर लगा दिया गया

तुम ईमान लाने के बाद अल्लाह का इनकार कैसे करोगे, जबकि तुम्हारे पास ईमान (विश्वास) पर दृढ़ता का सबसे बड़ा कारण मौजूद है! चुनाँचे तुम्हारे सामने अल्लाह की आयतें पढ़ी जाती हैं और स्वयं अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तुम्हारे लिए उनका स्पष्टीकरण करते हैं। और जो व्यक्ति अल्लाह की पुस्तक तथा उसके रसूल की सुन्नत को थाम ले, तो वास्तव में अल्लाह ने उसे सीधे रास्ते की तौफीक़ प्रदान कर दी जिसमें कोई टेढ़ापन (कुटिलता) नहीं है।

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102

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِۦ وَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسْلِمُونَ

ऐ ईमान वालों ख़ुदा से डरो जितना उससे डरने का हक़ है और तुम (दीन) इस्लाम के सिवा किसी और दीन पर हरगिज़ न मरना

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! अपने पालनहार से वैसे ही डरो, जैसे उससे डरना चाहिए। और वह इस प्रकार कि उसके आदेशों का पालन करो, उसकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहो है और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करो। तथा अपने धर्म को मज़बूती से पकड़े रहो, यहाँ तक कि तुम्हारी मौत आए तो तुम इसी स्थिति में रहो।

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103

وَٱعْتَصِمُوا۟ بِحَبْلِ ٱللَّهِ جَمِيعًۭا وَلَا تَفَرَّقُوا۟ ۚ وَٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ كُنتُمْ أَعْدَآءًۭ فَأَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِكُمْ فَأَصْبَحْتُم بِنِعْمَتِهِۦٓ إِخْوَٰنًۭا وَكُنتُمْ عَلَىٰ شَفَا حُفْرَةٍۢ مِّنَ ٱلنَّارِ فَأَنقَذَكُم مِّنْهَا ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمْ ءَايَٰتِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ

और तुम सब के सब (मिलकर) ख़ुदा की रस्सी मज़बूती से थामे रहो और आपस में (एक दूसरे) के फूट न डालो और अपने हाल (ज़ार) पर ख़ुदा के एहसान को तो याद करो जब तुम आपस में (एक दूसरे के) दुश्मन थे तो ख़ुदा ने तुम्हारे दिलों में (एक दूसरे की) उलफ़त पैदा कर दी तो तुम उसके फ़ज़ल से आपस में भाई भाई हो गए और तुम गोया सुलगती हुईआग की भट्टी (दोज़ख) के लब पर (खडे) थे गिरना ही चाहते थे कि ख़ुदा ने तुमको उससे बचा लिया तो ख़ुदा अपने एहकाम यूं वाजेए करके बयान करता है ताकि तुम राहे रास्त पर आ जाओ

((ऐ ईमान वालो) किताब और सुन्नत को मज़बूती से पकड़े रहो और ऐसा कार्य न करो जिससे मतभेद में पड़ जाओ। और तुम अपने ऊपर अल्लाह की उस कृपा को याद करो, जब तुम इस्लाम से पूर्व एक-दूसरे के शत्रु थे, छोटी से छोटी बात पर आपस में लड़ते थे। फिर उसने इस्लाम के द्वारा तुम्हारे दिलों को जोड़ दिया। चुनांचे तुम उसकी कृपा से एक दूसरे पर दया करने वाले तथा एक दूसरे की भलाई चाहने वाले धार्मिक भाई बन गए। हालाँकि इससे पूर्व तुम कुफ्र के कारण आग में प्रवेश करने के कगार पर थे। फिर अल्लाह ने तुम्हें इस्लाम के द्वारा उससे बचा लिया और तुम्हें ईमान के लिए मार्गदर्शन किया। जिस तरह अल्लाह ने तुम्हारे लिए इसे बयान किया है, उसी तरह वह तुम्हारे लिए वे सारी बातें बयान करता है, जो दुनिया एवं आख़िरत में तुम्हारी स्थितियों को सुधारने वाली हैं। ताकि तुम सीधा मार्ग पा सको और धार्मिकता के पथ पर चल सको।

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104

وَلْتَكُن مِّنكُمْ أُمَّةٌۭ يَدْعُونَ إِلَى ٱلْخَيْرِ وَيَأْمُرُونَ بِٱلْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ ٱلْمُنكَرِ ۚ وَأُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ

और तुमसे एक गिरोह ऐसे (लोगों का भी) तो होना चाहिये जो (लोगों को) नेकी की तरफ़ बुलाए अच्छे काम का हुक्म दे और बुरे कामों से रोके और ऐसे ही लोग (आख़ेरत में) अपनी दिली मुरादें पायेंगे

(ऐ ईमान वालो) तुम्हारे अंदर एक समूह ऐसा होना चाहिए जो हर उस भलाई की ओर बुलाए जो अल्लाह को पसंद है, वह उस नेकी का आदेश दे जो शरीयत से प्रमाणित है और शुद्ध बुद्धि उसे अच्छा समझती है, तथा उस बुराई से रोके जिससे शरीयत ने रोका है और शुद्ध बुद्धि उसे बुरा समझती है। तथा इस गुण से सुसज्जित लोग ही दुनिया एवं आख़िरत में सफलता प्राप्त करने वाले हैं।

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105

وَلَا تَكُونُوا۟ كَٱلَّذِينَ تَفَرَّقُوا۟ وَٱخْتَلَفُوا۟ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلْبَيِّنَٰتُ ۚ وَأُو۟لَٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌۭ

और तुम (कहीं) उन लोगों के ऐसे न हो जाना जो आपस में फूट डाल कर बैठ रहे और रौशन (दलील) आने के बाद भी एक मुंह एक ज़बान न रहे और ऐसे ही लोगों के वास्ते बड़ा (भारी) अज़ाब है

(ऐ ईमान वालो) तुम उन किताब वालों की तरह न हो जाओ, जो विभेद करके गिरोहों तथा दलों में बट गए। उन्होंने अल्लाह की ओर से उनके पास स्पष्ट निशानियाँ आ जाने के बाद अपने धर्म के बारे में मतभेद किया। और इन उक्त लोगों के लिए अल्लाह की ओर से बड़ी यातना है।

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106

يَوْمَ تَبْيَضُّ وُجُوهٌۭ وَتَسْوَدُّ وُجُوهٌۭ ۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ٱسْوَدَّتْ وُجُوهُهُمْ أَكَفَرْتُم بَعْدَ إِيمَٰنِكُمْ فَذُوقُوا۟ ٱلْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ

(उस दिन से डरो) जिस दिन कुछ लोगों के चेहरे तो सफैद नूरानी होंगे और कुछ (लोगो) के चेहरे सियाह जिन लोगों के मुहॅ में कालिक होगी (उनसे कहा जायेगा) हाए क्यों तुम तो ईमान लाने के बाद काफ़िर हो गए थे अच्छा तो (लो) (अब) अपने कुफ़्र की सज़ा में अज़ाब (के मजे) चखो

यह बड़ा अज़ाब उनपर प्रलय के दिन उतरेगा, जब ईमान वालों के चेहरे खुशी और प्रसन्नता से चमक रहे होंगे और काफ़िरों के चेहरे दु:ख और उदासी से काले पड़ जाएंगे। चुनांचे उस महान दिन पर जिन लोगों के चेहरे काले पड़ गए होंगे, उन्हें डाँटते हुए कहा जाएगा : क्या तुमने, अपनी पुष्टि और स्वीकृति के बाद, अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसके उस वचन का इनकार कर दिया, जो उसने तुमसे लिया था कि तुम उसके साथ किसी भी चीज़ को साझी नहीं ठहराओगेॽ! अतः तुम अल्लाह के उस अज़ाब का स्वाद चखो जो उसने तुम्हारे लिए तुम्हारे कुफ्र के कारण तैयार कर रखा है।

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107

وَأَمَّا ٱلَّذِينَ ٱبْيَضَّتْ وُجُوهُهُمْ فَفِى رَحْمَةِ ٱللَّهِ هُمْ فِيهَا خَٰلِدُونَ

और जिनके चेहरे पर नूर बरसता होगा वह तो ख़ुदा की रहमत(बहिश्त) में होंगे (और) उसी में सदा रहेंगे

और जिनके चेहरे चमक रहे होंगे, उनका ठिकाना नेमतों वाली जन्नतों में होगा, जिनमें वे हमेशा रहेंगे। वे ऐसी नेमतों में होंगे, जो न कभी खत्म होंगी और न कभी बदलेंगी।

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108

تِلْكَ ءَايَٰتُ ٱللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِٱلْحَقِّ ۗ وَمَا ٱللَّهُ يُرِيدُ ظُلْمًۭا لِّلْعَٰلَمِينَ

(ऐ रसूल) ये ख़ुदा की आयतें हैं जो हम तुमको ठीक (ठीक) पढ़ के सुनाते हैं और ख़ुदा सारे जहॉन के लोगों (से किसी) पर जुल्म करना नहीं चाहता

(ऐ नबी) हम आपको अल्लाह के वचन एवं चेतावनी पर आधारित ये आयतें, समाचार में सच्चाई और प्रावधानों में न्याय के साथ पढ़कर सुनाते हैं। और अल्लाह संसार वालों में से किसी पर भी अत्याचार नहीं करना चाहता, बल्कि वह किसी को उसके हाथों की कमाई के कारण ही दंडित करता है।

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109

وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ وَإِلَى ٱللَّهِ تُرْجَعُ ٱلْأُمُورُ

और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (सब) ख़ुदा ही का है और (आख़िर) सब कामों की रूज़ु ख़ुदा ही की तरफ़ है

जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है सबका स्वामी (राजा) अल्लाह सर्वशक्तिमान है, रचना की दृष्टि से भी और प्रबंधन की दृष्टि से भी, और उसकी सारी सृष्टि का मामला अंततः उसी सर्वशक्तिमान की ओर लौटना है। फिर वह उनमें से हर एक को उसकी पात्रता के अनुसार बदला देगा।

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110

كُنتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِٱلْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ ٱلْمُنكَرِ وَتُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ ۗ وَلَوْ ءَامَنَ أَهْلُ ٱلْكِتَٰبِ لَكَانَ خَيْرًۭا لَّهُم ۚ مِّنْهُمُ ٱلْمُؤْمِنُونَ وَأَكْثَرُهُمُ ٱلْفَٰسِقُونَ

तुम क्या अच्छे गिरोह हो कि (लोगों की) हिदायत के वास्ते पैदा किये गए हो तुम (लोगों को) अच्छे काम का हुक्म करते हो और बुरे कामों से रोकते हो और ख़ुदा पर ईमान रखते हो और अगर अहले किताब भी (इसी तरह) ईमान लाते तो उनके हक़ में बहुत अच्छा होता उनमें से कुछ ही तो ईमानदार हैं और अक्सर बदकार

(ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत के लोगो!) तुम अपने ईमान एवं कर्म में सबसे अच्छी उम्मत हो, जिसे अल्लाह ने लोगों के लिए प्रकट किया है, और तुम लोगों के लिए सबसे अधिक लाभकारी लोग हो, तुम उस अच्छी बात का आदेश देते हो जो शरीयत से प्रमाणित है और शुद्ध बुद्धि उसे अच्छा समझती है, और उस बुराई से रोकते हो जिससे शरीयत ने रोका है और शुद्ध बुद्धि उसे बुरा समझती है। और तुम अल्लाह पर दृढ़ विश्वास रखते हो, जिसकी तुम्हारे कार्य से पुष्टि होती है। और यदि किताब वाले यहूदी और ईसाई मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर ईमान लाते, तो यह उनके लिए दुनिया एवं आख़़िरत दोनों में बेहतर होता। किताब वालों में से बहुत कम लोग हैं, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की लाई हुई शरीयत पर विश्वास रखते हैं, जबकि उनमें से अधिकांश लोग अल्लाह के धर्म और उसकी शरीयत से बाहर हैं।

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Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.