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16. An-Nahl

The Bee · Meccan · 128 ayahs

سُورَةُ النَّحۡلِ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 71–80 of 128

71

وَٱللَّهُ فَضَّلَ بَعْضَكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ فِى ٱلرِّزْقِ ۚ فَمَا ٱلَّذِينَ فُضِّلُوا۟ بِرَآدِّى رِزْقِهِمْ عَلَىٰ مَا مَلَكَتْ أَيْمَٰنُهُمْ فَهُمْ فِيهِ سَوَآءٌ ۚ أَفَبِنِعْمَةِ ٱللَّهِ يَجْحَدُونَ

और ख़ुदा ही ने तुममें से बाज़ को बाज़ पर रिज़क (दौलत में) तरजीह दी है फिर जिन लोगों को रोज़ी ज्यादा दी गई है वह लोग अपनी रोज़ी में से उन लोगों को जिन पर उनका दस्तरस (इख्तेयार) है (लौन्डी ग़ुलाम वग़ैरह) देने वाला नहीं (हालॉकि इस माल में तो सब के सब मालिक गुलाम वग़ैरह) बराबर हैं तो क्या ये लोग ख़ुदा की नेअमत के मुन्किर हैं

अल्लाह ने तुम्हें जो रोज़ी दी है, उसमें कुछ को दूसरों पर श्रेष्ठता प्रदान की है। इसलिए तुममें से किसी को धनी तो किसी को निर्धन, किसी को राजा तो किसी को प्रजा बनाया है। तो जिन्हें अल्लाह ने रोज़ी के मामले में आगे रखा है, वे अल्लाह के दिए हुए धन को अपने दासों के हवाले करने वाले नहीं हैं ताकि वे राज्य में उनके साथ समान भागीदार हो सकें। तो भला वे कैसे पसंद करते हैं कि अल्लाह के उसके बंदों में से कोई साझी हों, जबकि उन्हें खुद अपने बारे में यह पसंद नहीं कि उनके दासों में से उनके कोई साझी हों जो उनके साथ बराबर हों? भला यह कैसा अन्याय है? और अल्लाह की नेमतों का इससे बड़ा इनकार और क्या हो सकता है?

72

وَٱللَّهُ جَعَلَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَٰجًۭا وَجَعَلَ لَكُم مِّنْ أَزْوَٰجِكُم بَنِينَ وَحَفَدَةًۭ وَرَزَقَكُم مِّنَ ٱلطَّيِّبَٰتِ ۚ أَفَبِٱلْبَٰطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَتِ ٱللَّهِ هُمْ يَكْفُرُونَ

और ख़ुदा ही ने तुम्हारे लिए बीबियाँ तुम ही में से बनाई और उसी ने तुम्हारे वास्ते तुम्हारी बीवियों से बेटे और पोते पैदा किए और तुम्हें पाक व पाकीज़ा रोज़ी खाने को दी तो क्या ये लोग बिल्कुल बातिल (सुल्तान बुत वग़ैरह) पर ईमान रखते हैं और ख़ुदा की नेअमत (वहदानियत वग़ैरह से) इन्कार करते हैं

और (ऐ लोगो!) अल्लाह ने तुम्हारे लिए तुम्हारे ही वर्ग से पत्नियाँ बनाईं, जिनसे तुम शांति प्राप्त करते हो, और तुम्हारी पत्नियों से तुम्हारे लिए बेटे और पोते बनाए, और तुम्हें खाने की पवित्र चीज़ें प्रदान कीं (जैसे- मांस, अनाज और फल)। तो क्या वे झूठी मूर्तियों और पत्थरों को मानते हैं, और अल्लाह की उन ढेर सारी नेमतों का इनकार करते हैं, जिन्हें वे गिन भी नहीं सकते, और अल्लाह का शुक्रिया नहीं अदा करते कि केवल उसी पर ईमान लाएँ?

73

وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَمْلِكُ لَهُمْ رِزْقًۭا مِّنَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ شَيْـًۭٔا وَلَا يَسْتَطِيعُونَ

और ख़ुदा को छोड़कर ऐसी चीज़ की परसतिश करते हैं जो आसमानों और ज़मीन में से उनको रिज़क़ देने का कुछ भी न एख्तियार रखते हैं और न कुदरत हासिल कर सकते हैं

और ये बहुदेववादी लोग अल्लाह के अलावा ऐसी मूर्तियों की पूजा करते हैं, जो न उन्हें आकाशों तथा धरती से कुछ भी रोज़ी प्रदान करने का अधिकार रखती हैं और न ही उन्हें इसका अधिकार प्राप्त हो सकता है, क्योंकि वे निर्जीव चीज़ें हैं, जिनके पास जीवन या ज्ञान नहीं है।

74

فَلَا تَضْرِبُوا۟ لِلَّهِ ٱلْأَمْثَالَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ

तो तुम (दुनिया के लोगों पर कयास करके ख़ुद) मिसालें न गढ़ो बेशक ख़ुदा (सब कुछ) जानता है और तुम नहीं जानते

अतः (ऐ लोगो!) इन मूर्तियों में से जो लाभ या हानि के मालिक नहीं हैं किसी को अल्लाह के समान न ठहराओ। क्योंकि अल्लाह के समान कोई नहीं है कि उसे तुम इबादत में उसका साझी मानो। अल्लाह अपनी महिमा और पूर्णता के गुणों को जानता है और तुम उसे नहीं जानते। यही कारण है कि तुम बहुदेववाद में पड़ जाते हो और दावा करते हो कि वह तुम्हारी मूर्तियों के समान है।

75

۞ ضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًا عَبْدًۭا مَّمْلُوكًۭا لَّا يَقْدِرُ عَلَىٰ شَىْءٍۢ وَمَن رَّزَقْنَٰهُ مِنَّا رِزْقًا حَسَنًۭا فَهُوَ يُنفِقُ مِنْهُ سِرًّۭا وَجَهْرًا ۖ هَلْ يَسْتَوُۥنَ ۚ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ

एक मसल ख़ुदा ने बयान फरमाई कि एक ग़ुलाम है जो दूसरे के कब्जे में है (और) कुछ भी एख्तियार नहीं रखता और एक शख़्श वह है कि हमने उसे अपनी बारगाह से अच्छी (खासी) रोज़ी दे रखी है तो वह उसमें से छिपा के दिखा के (ग़रज़ हर तरह ख़ुदा की राह में) ख़र्च करता है क्या ये दोनो बराबर हो सकते हैं (हरगिज़ नहीं) अल्हमदोलिल्लाह (कि वह भी उसके मुक़र्रर हैं) मगर उनके बहुतेरे (इतना भी) नहीं जानते

अल्लाह ने बहुदेववादियों के खंडन के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया है : एक पराधीन दास है, जिसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। उसके पास खर्च करने के लिए कुछ भी नहीं है। और एक आज़ाद व्यक्ति है, जिसे हमने अपने पास से वैध धन प्रदान किया है, जिसमें वह जैसे चाहे, व्यवहार करे। चुनाँचे वह उसमें से गुप्त रूप से और खुले तौर पर जितना चाहता है, खर्च करता है। तो ये दोनों व्यक्ति बराबर नहीं हो सकते। फिर तुम उस अल्लाह को, जो मालिक है, अपने स्वामित्व की चीज़ों में जैसे चाहे व्यवहार करता है, अपनी असहाय मूर्तियों के बराबर कैसे बनाते हो?! सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो प्रशंसा का हक़दार है। परंतु अधिकतर बहुदेववादी इस बात को नहीं जानते कि पूज्यता एकमात्र अल्लाह ही के लिए विशिष्ट है और अकेला वही पूजा किए जाने के योग्य है।

76

وَضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًۭا رَّجُلَيْنِ أَحَدُهُمَآ أَبْكَمُ لَا يَقْدِرُ عَلَىٰ شَىْءٍۢ وَهُوَ كَلٌّ عَلَىٰ مَوْلَىٰهُ أَيْنَمَا يُوَجِّههُّ لَا يَأْتِ بِخَيْرٍ ۖ هَلْ يَسْتَوِى هُوَ وَمَن يَأْمُرُ بِٱلْعَدْلِ ۙ وَهُوَ عَلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ

और ख़ुदा एक दूसरी मसल बयान फरमाता है दो आदमी हैं कि एक उनमें से बिल्कुल गूँगा उस पर गुलाम जो कुछ भी (बात वग़ैरह की) कुदरत नहीं रखता और (इस वजह से) वह अपने मालिक को दूभर हो रहा है कि उसको जिधर भेजता है (ख़ैर से) कभी भलाई नहीं लाता क्या ऐसा ग़ुलाम और वह शख़्श जो (लोगों को) अदल व मियाना रवी का हुक्म करता है वह खुद भी ठीक सीधी राह पर क़ायम है (दोनों बराबर हो सकते हैं (हरगिज़ नहीं)

अल्लाह ने उनके तर्क के खंडन के लिए एक और उदाहरण दिया है, जो दो आदमियों का उदाहरण है : उनमें से एक गूँगा है। जो अपने बहरेपन और गूँगेपन के कारण, न सुनता है, न बोलता है और न समझता है। वह खुद को और दूसरों को लाभ पहुँचाने में अक्षम है, तथा वह अपने अभिभावक पर एक भारी बोझ है। वह उसे जहाँ भी भेजता है, कोई भलाई लेकर नहीं आता और न किसी अपेक्षित चीज़ को प्राप्त करने में सफल होता है। क्या जिसकी यह स्थिति है, उसके बराबर हो सकता है, जो अच्छी तरह सुनने और बोलने वाला है, तथा उसका लाभ दूसरों तक पहुँचने वाला है। क्योंकि वह लोगों को न्याय करने का आदेश देता है, और वह अपने आप में सदाचारी है। अतः वह एक स्पष्ट मार्ग पर है, जिसमें कोई संदेह और टेढ़ापन नहीं है?! तो भला तुम (ऐ बहुदेववादियो!) अल्लाह को, जो महिमा और पूर्णता के गुणों से विशिष्ट है, अपनी उन मूर्तियों के बराबर कैसे बनाते हो, जो न सुन सकती हैं, न बोल सकती हैं और न कोई लाभ पहुँचा सकती हैं और न कोई हानि दूर कर सकती हैं?!

77

وَلِلَّهِ غَيْبُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَمَآ أَمْرُ ٱلسَّاعَةِ إِلَّا كَلَمْحِ ٱلْبَصَرِ أَوْ هُوَ أَقْرَبُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ

और सारे आसमान व ज़मीन की ग़ैब की बातें ख़ुदा ही के लिए मख़सूस हैं और ख़ुदा क़यामत का वाकेए होना तो ऐसा है जैसे पलक का झपकना बल्कि इससे भी जल्दी बेशक ख़ुदा हर चीज़ पर क़ुदरत कामेला रखता है

आकाशों और धरती की छिपी बातों का ज्ञान केवल अल्लाह के पास है। उसका ज्ञान उसी के साथ विशिष्ट है, उसकी किसी सृष्टि को इसका ज्ञान नहीं है। और क़ियामत का मामला, जो उसके साथ विशिष्ट ग़ैब (परोक्ष) की बातों में से है, उसके आने की गति में जब वह उसका इरादा करे, तो वह एक आँख की पलक को बंद करने और खोलने की तरह है, बल्कि वह इससे भी अधिक निकट है। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है। उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती। जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है, तो उससे कहता है : (हो जा), तो वह हो जाती है।

78

وَٱللَّهُ أَخْرَجَكُم مِّنۢ بُطُونِ أُمَّهَٰتِكُمْ لَا تَعْلَمُونَ شَيْـًۭٔا وَجَعَلَ لَكُمُ ٱلسَّمْعَ وَٱلْأَبْصَٰرَ وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۙ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ

और ख़ुदा ही ने तुम्हें तुम्हारी माओं के पेट से निकाला (जब) तुम बिल्कुल नासमझ थे और तुम को कान दिए और ऑंखें (अता की) दिल (इनायत किए) ताकि तुम शुक्र करो

और अल्लाह ने तुम्हें (ऐ लोगो!) तुम्हारी माताओं के पेट से, गर्भावस्था के समय के पूरे होने के बाद, शिशु के रूप में निकाला, तुम कुछ नहीं जानते थे, और उसने तुम्हारे लिए कान बनाए ताकि उससे सुन सको, और आँखें बनाईं ताकि उनसे देख सको और हृदय बनाए ताकि उससे समझ सको, इस उम्मीद में कि तुम उसकी नेमतों का शुक्रिया अदा करो।

79

أَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَى ٱلطَّيْرِ مُسَخَّرَٰتٍۢ فِى جَوِّ ٱلسَّمَآءِ مَا يُمْسِكُهُنَّ إِلَّا ٱللَّهُ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ

क्या उन लोगों ने परिन्दों की तरफ ग़ौर नहीं किया जो आसमान के नीचे हवा में घिरे हुए (उड़ते रहते हैं) उनको तो बस ख़ुदा ही (गिरने से ) रोकता है बेशक इसमें भी (कुदरते ख़ुदा की) ईमानदारों के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं

क्या बहुदेववादियों ने पक्षियों को वशीभूत, हवा में उड़ने के लिए तैयार नहीं देखा, कि अल्लाह ने उन्हें पंख प्रदान करके और हवा को हल्की बनाकर तथा उन्हें अपने पंख को फैलाने और समेटने की प्रेरणा देकर कैसे उड़ने के लायक़ बनाया? उन्हें हवा में गिरने से केवल अल्लाह सर्वशक्तिमान ही रोकता है। निश्चय इस वशीकरण और गिरने से थामे रखे में उन लोगों के लिए संकेत हैं, जो अल्लाह पर विश्वास रखते हैं; क्योंकि वही लोग संकेतों और शिक्षाओं से लाभ उठाते हैं।

80

وَٱللَّهُ جَعَلَ لَكُم مِّنۢ بُيُوتِكُمْ سَكَنًۭا وَجَعَلَ لَكُم مِّن جُلُودِ ٱلْأَنْعَٰمِ بُيُوتًۭا تَسْتَخِفُّونَهَا يَوْمَ ظَعْنِكُمْ وَيَوْمَ إِقَامَتِكُمْ ۙ وَمِنْ أَصْوَافِهَا وَأَوْبَارِهَا وَأَشْعَارِهَآ أَثَٰثًۭا وَمَتَٰعًا إِلَىٰ حِينٍۢ

और ख़ुदा ही ने तुम्हारे घरों को तुम्हारा ठिकाना क़रार दिया और उसी ने तुम्हारे वास्ते चौपायों की खालों से तुम्हारे लिए (हलके फुलके) डेरे (ख़ेमे) बना जिन्हें तुम हलका पाकर अपने सफर और हजर (ठहरने) में काम लाते हो और इन चारपायों की ऊन और रुई और बालो से एक वक्त ख़ास (क़यामत तक) के लिए तुम्हारे बहुत से असबाब और अबकार आमद (काम की) चीज़े बनाई

अल्लाह ने तुम्हारे पत्थर एवं अन्य चीज़ों के बनाए हुए घरों को तुम्हारे लिए स्थिरता और विश्राम का स्थान बनाया। तथा ऊँट, गाय और बकरी की खालों से तुम्हारे लिए शहरी घरों की तरह रेगिस्तान (दीहात) में तंबू और गुंबद बनाए, जिन्हें तुम्हारे लिए अपने सफ़र के दौरान एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना आसान होता है, और तुम्हारे पड़ाव डालने के समय उन्हें आसानी से लगाया जा सकता है। तथा भेड़ के ऊन, ऊँट के रोएँ और बकरी के बालों से तुम्हारे घरों के सामान, कपड़े और ग़िलाफ़ बनाए, जिनसे तुम एक निर्धारित समय तक लाभ उठाते हो।

Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.