وَإِذَا بَدَّلْنَآ ءَايَةًۭ مَّكَانَ ءَايَةٍۢ ۙ وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يُنَزِّلُ قَالُوٓا۟ إِنَّمَآ أَنتَ مُفْتَرٍۭ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
और (ऐ रसूल) हम जब एक आयत के बदले दूसरी आयत नाज़िल करते हैं तो हालॉकि ख़ुदा जो चीज़ नाज़िल करता है उस (की मसलहतों) से खूब वाक़िफ है मगर ये लोग (तुम को) कहने लगते हैं कि तुम बस बिल्कुल मुज़तरी (ग़लत बयान करने वाले) हो बल्कि खुद उनमें के बहुतेरे (मसालेह को) नहीं जानते
जब हम क़ुरआन की किसी आयत का हुक्म दूसरी आयत के ज़रिए निरस्त करते हैं (और अल्लाह उसे अधिक जानने वाला है जो वह क़ुरआन में से किसी हिकमत के कारण निरस्त करता है और उसे भी जानने वाला है, जो वह उसमें से निरस्त नहीं करता है), तो वे कहते हैं : (ऐ मुहम्मद!) तुम तो झूठे हो, अल्लाह पर झूठ गढ़ते हो। बल्कि, उनमें से अधिकांश को यह नहीं पता कि निरस्त करना अल्लाह की व्यापक हिकमत के तहत होता है।