قُل لِّعِبَادِىَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يُقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُنفِقُوا۟ مِمَّا رَزَقْنَٰهُمْ سِرًّۭا وَعَلَانِيَةًۭ مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِىَ يَوْمٌۭ لَّا بَيْعٌۭ فِيهِ وَلَا خِلَٰلٌ
(ऐ रसूल) मेरे वह बन्दे जो ईमान ला चुके उन से कह दो कि पाबन्दी से नमाज़ पढ़ा करें और जो कुछ हमने उन्हें रोज़ी दी है उसमें से (ख़ुदा की राह में) छिपाकर या दिखा कर ख़र्च किया करे उस दिन (क़यामत) के आने से पहल जिसमें न तो (ख़रीदो) फरोख्त ही (काम आएगी) न दोस्ती मोहब्बत काम (आएगी)
(ऐ रसूल!) आप मोमिनों से कह दें : ऐ मोमिनो! पूर्ण रूप से नमाज़ पढ़ो, और अल्लाह के दिए हुए धन से आवश्यक और वांछनीय कार्यों में खर्च करो, रियाकारी के डर से गुप्त रूप से, और खुले तौर पर इसलिए कि दूसरे लोग तुम्हारा अनुसरण करें। इससे पहले कि वह दिन आ जाए, जिसमें न कोई क्रय-विक्रय होगा, न छुड़ौती स्वीकार की जाएगी कि उसके द्वारा अल्लाह के अज़ाब से छुटकारा प्राप्त कर लिया जाए, और न कोई दोस्ती होगी कि एक दोस्त अपने दोस्त के लिए सिफ़ारिश कर दे।