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14. Ibrahim

Abraham · Meccan · 52 ayahs

سُورَةُ إِبۡرَاهِيمَ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 31–40 of 52

31

قُل لِّعِبَادِىَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يُقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُنفِقُوا۟ مِمَّا رَزَقْنَٰهُمْ سِرًّۭا وَعَلَانِيَةًۭ مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِىَ يَوْمٌۭ لَّا بَيْعٌۭ فِيهِ وَلَا خِلَٰلٌ

(ऐ रसूल) मेरे वह बन्दे जो ईमान ला चुके उन से कह दो कि पाबन्दी से नमाज़ पढ़ा करें और जो कुछ हमने उन्हें रोज़ी दी है उसमें से (ख़ुदा की राह में) छिपाकर या दिखा कर ख़र्च किया करे उस दिन (क़यामत) के आने से पहल जिसमें न तो (ख़रीदो) फरोख्त ही (काम आएगी) न दोस्ती मोहब्बत काम (आएगी)

(ऐ रसूल!) आप मोमिनों से कह दें : ऐ मोमिनो! पूर्ण रूप से नमाज़ पढ़ो, और अल्लाह के दिए हुए धन से आवश्यक और वांछनीय कार्यों में खर्च करो, रियाकारी के डर से गुप्त रूप से, और खुले तौर पर इसलिए कि दूसरे लोग तुम्हारा अनुसरण करें। इससे पहले कि वह दिन आ जाए, जिसमें न कोई क्रय-विक्रय होगा, न छुड़ौती स्वीकार की जाएगी कि उसके द्वारा अल्लाह के अज़ाब से छुटकारा प्राप्त कर लिया जाए, और न कोई दोस्ती होगी कि एक दोस्त अपने दोस्त के लिए सिफ़ारिश कर दे।

32

ٱللَّهُ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَخْرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزْقًۭا لَّكُمْ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلْفُلْكَ لِتَجْرِىَ فِى ٱلْبَحْرِ بِأَمْرِهِۦ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلْأَنْهَٰرَ

ख़ुदा ही ऐसा (क़ादिर तवाना) है जिसने सारे आसमान व ज़मीन पैदा कर डाले और आसमान से पानी बरसाया फिर उसके ज़रिए से (मुख्तलिफ दरख्तों से) तुम्हारी रोज़ा के वास्ते (तरह तरह) के फल पैदा किए और तुम्हारे वास्ते कश्तियां तुम्हारे बस में कर दी-ताकि उसके हुक्म से दरिया में चलें और तुम्हारे वास्ते नदियों को तुम्हारे एख्तियार में कर दिया

अल्लाह वह है, जिसने आकाशों और धरती को किसी पूर्व उदाहरण के बिना पैदा किया, और आकाश से बारिश का पानी उतारा, फिर उस उतारे हुए पानी से (ऐ लोगो!) तुम्हारी जीविका के लिए फलों की क़िस्मों को निकाला और नावों को तुम्हारे वश में कर दिया, जो पानी के ऊपर उसके अनुमान के अनुसार चलती हैं, और नदियों को तुम्हारे लिए वशीभूत कर दिया, ताकि उनसे पानी पिओ और अपने पशुओं और अपनी खेतियों को सैराब करो।

33

وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ دَآئِبَيْنِ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ

और सूरज और चाँद को तुम्हारा ताबेदार बना दिया कि सदा फेरी किया करते हैं और रात और दिन को तुम्हारे क़ब्ज़े में कर दिया कि हमेशा हाज़िर रहते हैं

उसने सूर्य और चाँद को तुम्हारे लिए वशीभूत कर दिया, जो लगातार गतिशील हैं, तथाा दिन और रात को तुम्हारे लिए वशीभूत कर दिया, जो एक-दूसरे के बाद आते-जाते हैं; रात तुम्हारे सोने और आराम करने के लिए और दिन तुम्हारी गतिविधि और दौड़-धूप करने के लिए है।

34

وَءَاتَىٰكُم مِّن كُلِّ مَا سَأَلْتُمُوهُ ۚ وَإِن تَعُدُّوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ لَا تُحْصُوهَآ ۗ إِنَّ ٱلْإِنسَٰنَ لَظَلُومٌۭ كَفَّارٌۭ

(और अपनी ज़रुरत के मुवाफिक) जो कुछ तुमने उससे माँगा उसमें से (तुम्हारी ज़रूरत भर) तुम्हे दिया और तुम ख़ुदा की नेमतो गिनती करना चाहते हो तो गिन नहीं सकते हो तू बड़ा बे इन्साफ नाशुक्रा है

और उसने तुम्हें उन सब चीज़ों में से प्रदान किया, जो तुमने माँगीं और जो तुमने नहीं माँगीं। यदि तुम अल्लाह की नेमतों की गणना करो, तो उनकी बहुतायत और बहुलता के कारण उनकी गणना नहीं कर सकते। क्योंकि तुम्हारे लिए जो कुछ उल्लेख किया गया है, वे उनके कुछ उदाहरण हैं। निश्चय इनसान अपने आप पर बड़ा अत्याचार करने वाला, अल्लाह सर्वशक्तिमान की नेमतों का बहुत कृतघ्न है।

35

وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِيمُ رَبِّ ٱجْعَلْ هَٰذَا ٱلْبَلَدَ ءَامِنًۭا وَٱجْنُبْنِى وَبَنِىَّ أَن نَّعْبُدَ ٱلْأَصْنَامَ

और (वह वक्त याद करो) जब इबराहीम ने (ख़ुदा से) अर्ज़ की थी कि परवरदिगार इस शहर (मक्के) को अमन व अमान की जगह बना दे और मुझे और मेरी औलाद को इस बात को बचा ले कि बुतों की परसतिश करने लगे

(ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब इबराहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने बेटे इसमाईल और उनकी माँ हाजर को मक्का की घाटी में रहने के लिए छोड़ने के बाद दुआ की : ऐ मेरे पालनहार! इस नगर - मक्का - को, जिसमें मैंने अपने परिवार को रहने के लिए छोड़ा है, शांति एवं सुरक्षा वाला नगर बना दे। जिसमें कोई खून न बहाया जाए, और किसी पर अत्याचार न किया जाए। तथा मुझे और मेरे बच्चों को मूर्तिपूजा से दूर रख।

36

رَبِّ إِنَّهُنَّ أَضْلَلْنَ كَثِيرًۭا مِّنَ ٱلنَّاسِ ۖ فَمَن تَبِعَنِى فَإِنَّهُۥ مِنِّى ۖ وَمَنْ عَصَانِى فَإِنَّكَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ

ऐ मेरे पालने वाले इसमें शक़ नहीं कि इन बुतों ने बहुतेरे लोगों को गुमराह बना छोड़ा तो जो शख़्श मेरी पैरवी करे तो वह मुझ से है और जिसने मेरी नाफ़रमानी की (तो तुझे एख्तेयार है) तू तो बड़ा बख्शने वपला मेहरबान है)

ऐ मेरे पालनहार! मूर्तियों ने बहुत से लोगों को गुमराह किया है। क्योंकि उन्होंने यह सोचा कि ये मूर्तियाँ उनके लिए सिफ़ारिश करेंगी। इसलिए वे इनके फ़ितने (प्रलोभन) में पड़ गए और अल्लाह को छोड़कर इनकी पूजा की। अतः लोगों में से जिसने भी अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसके आज्ञापालन में मेरा अनुसरण किया, वह मेरे दल और मेरे अनुयायियों में से है। और जिसने मेरी अवज्ञा की और अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसके आज्ञापालन में मेरा अनुसरण नहीं किया, तो (ऐ मेरे रब!) तू जिनके गुनाहों को क्षमा करना चाहे, क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।

37

رَّبَّنَآ إِنِّىٓ أَسْكَنتُ مِن ذُرِّيَّتِى بِوَادٍ غَيْرِ ذِى زَرْعٍ عِندَ بَيْتِكَ ٱلْمُحَرَّمِ رَبَّنَا لِيُقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ فَٱجْعَلْ أَفْـِٔدَةًۭ مِّنَ ٱلنَّاسِ تَهْوِىٓ إِلَيْهِمْ وَٱرْزُقْهُم مِّنَ ٱلثَّمَرَٰتِ لَعَلَّهُمْ يَشْكُرُونَ

ऐ हमारे पालने वाले मैने तेरे मुअज़िज़ (इज्ज़त वाले) घर (काबे) के पास एक बेखेती के (वीरान) बियाबान (मक्का) में अपनी कुछ औलाद को (लाकर) बसाया है ताकि ऐ हमारे पालने वाले ये लोग बराबर यहाँ नमाज़ पढ़ा करें तो तू कुछ लोगों के दिलों को उनकी तरफ माएल कर (ताकि वह यहाँ आकर आबाद हों) और उन्हें तरह तरह के फलों से रोज़ी अता कर ताकि ये लोग (तेरा) शुक्र करें

ऐ हमारे पालनहार! मैंने अपनी कुछ संतान, अर्थात् अपने बेटे इसमाईल और उसके बेटों को तेरे सम्मानित घर के पास एक ऐसी घाटी में बसाया है, जिसमें कोई खेती या पानी नहीं है। ऐ हमारे पालनहार! मैंने उन्हें उसके पास इसलिए बसाया है कि वे उसमें नमाज़ क़ायम करें। इसलिए (ऐ मेरे रब!) लोगों के दिलों को इनकी ओर और इस नगर की ओर प्रलोभित कर दे, और उन्हें फलों से रोज़ी प्रदान कर, ताकि वे अपने ऊपर तेरे उपकार का शुक्रिया अदा करें।

38

رَبَّنَآ إِنَّكَ تَعْلَمُ مَا نُخْفِى وَمَا نُعْلِنُ ۗ وَمَا يَخْفَىٰ عَلَى ٱللَّهِ مِن شَىْءٍۢ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا فِى ٱلسَّمَآءِ

ऐ हमारे पालने वाले जो कुछ हम छिपाते हैं और जो कुछ ज़ाहिर करते हैं तू (सबसे) खूब वाक़िफ है और ख़ुदा से तो कोई चीज़ छिपी नहीं (न) ज़मीन में और न आसमान में उस ख़ुदा का (लाख लाख) शुक्र है

ऐ हमारे पालनहार! तू हर उस चीज़ को जानता है, जिसे हम छिपाते हैं और जिसे हम प्रकट करते हैं। तथा धरती या आकाश में अल्लाह से कोई भी चीज़ छिपी नहीं है। बल्कि वह उसे जानता है। इसलिए उसकी ओर हमारी आवश्यकता और हमारी निर्धनता उससे छिपी नहीं है।

39

ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى وَهَبَ لِى عَلَى ٱلْكِبَرِ إِسْمَٰعِيلَ وَإِسْحَٰقَ ۚ إِنَّ رَبِّى لَسَمِيعُ ٱلدُّعَآءِ

जिसने मुझे बुढ़ापा आने पर इस्माईल व इसहाक़ (दो फरज़न्द) अता किए इसमें तो शक़ नहीं कि मेरा परवरदिगार दुआ का सुनने वाला है

हर प्रकार का आभार और प्रशंसा उस अल्लाह महिमावान् के लिए है, जिसने नेक संतान प्रदान करने की मेरी दुआ स्वीकार कर ली। चुनाँचे उसने मेरे बुढ़ापे के बावजूद मुझे हाजर से इसमाईल और सारा से इसहाक़ प्रदान किया। निःसंदेह मेरा पवित्र पालनहार उसकी दुआ को सुनने वाला है, जो उससे दुआ करे।

40

رَبِّ ٱجْعَلْنِى مُقِيمَ ٱلصَّلَوٰةِ وَمِن ذُرِّيَّتِى ۚ رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَآءِ

(ऐ मेरे पालने वाले मुझे और मेरी औलाद को (भी) नमाज़ का पाबन्द बना दे और ऐ मेरे पालने वाले मेरी दुआ क़ुबूल फरमा

ऐ मेरे पालनहार! मुझे पूर्ण रूप से नमाज़ पढ़ने वाला बना और मेरी औलाद को भी नमाज़ क़ायम करने वालों में से बना। ऐ हमारे पालनहार! और मेरी दुआ स्वीकार कर और उसे अपने यहाँ स्वीकृत बना दे।

Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.