لَهُۥ مُعَقِّبَٰتٌۭ مِّنۢ بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِۦ يَحْفَظُونَهُۥ مِنْ أَمْرِ ٱللَّهِ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا۟ مَا بِأَنفُسِهِمْ ۗ وَإِذَآ أَرَادَ ٱللَّهُ بِقَوْمٍۢ سُوٓءًۭا فَلَا مَرَدَّ لَهُۥ ۚ وَمَا لَهُم مِّن دُونِهِۦ مِن وَالٍ
(उसके नज़दीक) सब बराबर हैं (आदमी किसी हालत में हो मगर) उस अकेले के लिए उसके आगे उसके पीछे उसके निगेहबान (फरिश्ते) मुक़र्रर हैं कि उसको हुक्म ख़ुदा से हिफाज़त करते हैं जो (नेअमत) किसी क़ौम को हासिल हो बेशक वह लोग खुद अपनी नफ्सानी हालत में तग्य्युर न डालें ख़ुदा हरगिज़ तग्य्युर नहीं डाला करता और जब ख़ुदा किसी क़ौम पर बुराई का इरादा करता है तो फिर उसका कोई टालने वाला नहीं और न उसका उसके सिवा कोई वाली और (सरपरस्त) है
सर्वशक्तिमान अल्लाह के कुछ फ़रिश्ते ऐसे हैं, जो इनसान के पास बारी-बारी आते हैं। उनमें से कुछ रात में आते हैं, और कुछ दिन के दौरान। वे अल्लाह के आदेश से इनसान की उन समस्त विपत्तियों से रक्षा करते हैं, जिनसे इनसान के बचाव का अल्लाह ने फ़ैसला कर रखा होता है। तथा वे इनसान की बातों और कार्यों को लिखते हैं। निःसंदेह अल्लाह किसी समुदाय की दशा को एक अच्छी स्थिति से उसके विपरीत एक अप्रिय स्थिति में नहीं बदलता, जब तक कि वे अपने स्वयं के धन्यवाद (शुक्र) की स्थिति को न बदल लें। और जब अल्लाह किसी क़ौम को विनष्ट करना चाहता है, तो उसके इरादे को कोई टाल नहीं सकता। और (ऐ लोगो!) तुम्हारा अल्लाह के सिवा कोई संरक्षक नहीं है, जो तुम्हारे मामलों का संरक्षण कर सके, कि तुम अपनी विपत्ति को दूर करने के लिए उसका सहारा ले सको।