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11. Hud

Hud · Meccan · 123 ayahs

سُورَةُ هُودٍ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 111–120 of 123

111

وَإِنَّ كُلًّۭا لَّمَّا لَيُوَفِّيَنَّهُمْ رَبُّكَ أَعْمَٰلَهُمْ ۚ إِنَّهُۥ بِمَا يَعْمَلُونَ خَبِيرٌۭ

और इसमें तो शक़ ही नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार उनकी कारस्तानियों का बदला भरपूर देगा (क्योंकि) जो उनकी करतूतें हैं उससे वह खूब वाक़िफ है

जिन मतभेद करने वालों का भी उल्लेख किया गया है, उनमें से प्रत्येक को (ऐ रसूल!) आपका पालनहार उसके कर्मों का अवश्य पूरा बदला देगा। चुनाँचे जिसका कर्म अच्छा था, उसका बदला अच्छा होगा और जिसका कर्म बुरा था, उसका बदला बुरा होगा। निःसंदेह अल्लाह उनके छोटे-छोटे कर्मों से भी सूचित है, उनके कामों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।

112

فَٱسْتَقِمْ كَمَآ أُمِرْتَ وَمَن تَابَ مَعَكَ وَلَا تَطْغَوْا۟ ۚ إِنَّهُۥ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ

तो (ऐ रसूल) जैसा तुम्हें हुक्म दिया है तुम और वह लोग भी जिन्होंने तुम्हारे साथ (कुफ्र से) तौबा की है ठीक साबित क़दम रहो और सरकशी न करो (क्योंकि) तुम लोग जो कुछ भी करते हो वह यक़ीनन देख रहा है

(ऐ रसूल) हमेशा सीधे रास्ते पर जमे रहें, जैसा कि अल्लाह ने आपको आदेश दिया है। अतः उसके आदेशों का पालन करें और उसके निषेधों से बचें। इसी तरह आपके साथ तौबा करने वाले मोमिन भी सीधे रास्ते पर जमे रहें। तथा तुम गुनाहों में पड़कर सीमा का उल्लंघन न करो। निश्चय ही वह तुम्हारे कर्मों को देख रहा है। उससे तुम्हारा कोई काम छिपा नहीं है और वह तुम्हें उसका बदला देगा।

113

وَلَا تَرْكَنُوٓا۟ إِلَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ فَتَمَسَّكُمُ ٱلنَّارُ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِنْ أَوْلِيَآءَ ثُمَّ لَا تُنصَرُونَ

और (मुसलमानों) जिन लोगों ने (हमारी नाफरमानी करके) अपने ऊपर ज़ुल्म किया है उनकी तरफ माएल (झुकना) न होना और वरना तुम तक भी (दोज़ख़) की आग आ लपटेगी और ख़ुदा के सिवा और लोग तुम्हारे सरपरस्त भी नहीं हैं फिर तुम्हारी मदद कोई भी नहीं करेगा

चाटुकारिता या स्नेह के साथ अत्याचारी काफ़िरों की ओर झुकाव न करें, अन्यथा इस झुकाव के कारण तुम्हें (भी) आग पकड़ लेगी। और अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई सहायक न होगा, जो तुम्हें उससे बचा सके। फिर तुम्हें कोई ऐसा नहीं मिलेगा जो तुम्हारी सहायता कर सके।

114

وَأَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ طَرَفَىِ ٱلنَّهَارِ وَزُلَفًۭا مِّنَ ٱلَّيْلِ ۚ إِنَّ ٱلْحَسَنَٰتِ يُذْهِبْنَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ ۚ ذَٰلِكَ ذِكْرَىٰ لِلذَّٰكِرِينَ

और (ऐ रसूल) दिन के दोनो किनारे और कुछ रात गए नमाज़ पढ़ा करो (क्योंकि) नेकियाँ यक़ीनन गुनाहों को दूर कर देती हैं और (हमारी) याद करने वालो के लिए ये (बातें) नसीहत व इबरत हैं

(ऐ रसूल) आप दिन के दोनों सिरों में अर्थात दिन की शुरुआत और उसके अंत में अच्छे ढंग से नमाज़ क़ायम कीजिए। तथा रात के कुछ क्षणों में भी उसकी स्थापना कीजिए। निःसंदेह अच्छे कार्य छोटे गुनाहों को मिटा देते हैं। उपर्युक्त बातें सीख लेने वालों के लिए, एक सीख हैं।

115

وَٱصْبِرْ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ ٱلْمُحْسِنِينَ

और (ऐ रसूल) तुम सब्र करो क्योंकि ख़ुदा नेकी करने वालों का अज्र बरबाद नहीं करता

तथा आपको सीधे मार्ग पर जमे रहने आदि का जो आदेश दिया गया है, उसे करने और सीमोल्लंघन एवं अत्याचारियों की ओर झुकाव से जो रोका गया है, उसे छोड़ने पर धैर्य से काम लें। निःसंदेह अल्लाह सदाचारियों का प्रतिफल नष्ट नहीं करता, बल्कि उनके अच्छे कर्मों को स्वीकार करता है और उनका बहुत अच्छा बदला देता है।

116

فَلَوْلَا كَانَ مِنَ ٱلْقُرُونِ مِن قَبْلِكُمْ أُو۟لُوا۟ بَقِيَّةٍۢ يَنْهَوْنَ عَنِ ٱلْفَسَادِ فِى ٱلْأَرْضِ إِلَّا قَلِيلًۭا مِّمَّنْ أَنجَيْنَا مِنْهُمْ ۗ وَٱتَّبَعَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مَآ أُتْرِفُوا۟ فِيهِ وَكَانُوا۟ مُجْرِمِينَ

फिर जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनमें कुछ लोग ऐसे अक़ल वाले क्यों न हुए जो (लोगों को) रुए ज़मीन पर फसाद फैलाने से रोका करते (ऐसे लोग थे तो) मगर बहुत थोड़े से और ये उन्हीं लोगों से थे जिनको हमने अज़ाब से बचा लिया और जिन लोगों ने नाफरमानी की थी वह उन्हीं (लज्ज़तों) के पीछे पड़े रहे और जो उन्हें दी गई थी और ये लोग मुजरिम थे ही

ऐसा क्यों न हुआ कि पहले के यातना ग्रस्त समुदायों में कुछ सदाचारी होते, जो उन समुदायों को कुफ्र से तथा गुनाहों के द्वारा धरती पर उपद्रव करने से रोकते। उनके अंदर ऐसे लोग नहीं रह गए थे, सिवाय उनमें से कुछ के जो भ्रष्टाचार से मना कर रहे थे। अतः उनकी अत्याचारी जाति को विनष्ट करते समय हमने उनको बचा लिया। जबकि उन जातियों के अत्याचारी लोग सुख और आनंद के पीछे लगे रहे। और ऐसा करके वे अन्याय कर रहे थे।

117

وَمَا كَانَ رَبُّكَ لِيُهْلِكَ ٱلْقُرَىٰ بِظُلْمٍۢ وَأَهْلُهَا مُصْلِحُونَ

और तुम्हारा परवरदिगार ऐसा (बे इन्साफ) कभी न था कि बस्तियों को जबरदस्ती उजाड़ देता और वहाँ के लोग नेक चलन हों

और आपका पालनहार (ऐ रसूल) ऐसा नहीं है कि वह बस्तियों में से किसी बस्ती को विनष्ट कर दे, जबकि उसके वासी धरती में सुधार का करने वाले हों। बल्कि वह उसे उसी समय विनष्ट करता है, जब उसके वासी कुफ्र, अत्याचार और गुनाहों के द्वारा बिगाड़ पैदा करने वाले हों।

118

وَلَوْ شَآءَ رَبُّكَ لَجَعَلَ ٱلنَّاسَ أُمَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ ۖ وَلَا يَزَالُونَ مُخْتَلِفِينَ

और अगर तुम्हारा परवरदिगार चाहता तो बेशक तमाम लोगों को एक ही (किस्म की) उम्मत बना देता (मगर) उसने न चाहा इसी (वजह से) लोग हमेशा आपस में फूट डाला करेगें

(ऐ रसूल) यदि आपका पालनहार चाहता कि सभी लोगों को सत्य के पथ पर चलने वाला एक समुदाय बना दे, तो ऐसा कर सकता था। परन्तु उसने ऐसा नहीं चाहा। अतः वे इच्छाओं के पीछे चलने और अत्याचार के कारण सत्य के बारे में हमेशा मतभेद करते रहेंगे।

119

إِلَّا مَن رَّحِمَ رَبُّكَ ۚ وَلِذَٰلِكَ خَلَقَهُمْ ۗ وَتَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنَ ٱلْجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ أَجْمَعِينَ

मगर जिस पर तुम्हारा परवरदिगार रहम फरमाए और इसलिए तो उसने उन लोगों को पैदा किया (और इसी वजह से तो) तुम्हारा परवरदिगार का हुक्म क़तई पूरा होकर रहा कि हम यक़ीनन जहन्नुम को तमाम जिन्नात और आदमियों से भर देगें

परन्तु जिन्हें अल्लाह सीधे मार्ग का सामर्थ्य प्रदानकर उनपर दया करे, तो वे अल्लाह महिमावान के एकेश्वरवाद में विभेद नहीं करेंगे। और इसी विभेद के द्वारा परीक्षण के लिए अल्लाह ने उन्हें पैदा किया है। चुनाँचे उनमें से कुछ अभागे हैं और कुछ भाग्यशाली। और (ऐ रसूल) आपके पालनहार की वह बात पूरी हुई, जिसका निर्णय उसने अनादिकाल में किया था कि वह जहन्नम को जिन्नों और इनसानों में से शैतान के अनुयायियों से भर देगा।

120

وَكُلًّۭا نَّقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنۢبَآءِ ٱلرُّسُلِ مَا نُثَبِّتُ بِهِۦ فُؤَادَكَ ۚ وَجَآءَكَ فِى هَٰذِهِ ٱلْحَقُّ وَمَوْعِظَةٌۭ وَذِكْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ

और (ऐ रसूल) पैग़म्बरों के हालत में से हम उन तमाम क़िस्सों को तुम से बयान किए देते हैं जिनसे हम तुम्हारे दिल को मज़बूत कर देगें और उन्हीं क़िस्सों में तुम्हारे पास हक़ (क़ुरान) और मोमिनीन के लिए नसीहत और याद दहानी भी आ गई

(ऐ रसूल) आपसे पूर्व नबियों की ख़बरों में से जो भी ख़बर हम आपको सुना रहे हैं, उसका उद्देश्य यह है कि हम उसके द्वारा आपके ह्रदय को सत्य पर सुदृढ़ कर दें और उसे मज़बूत कर दें। तथा इस सूरत में आपके पास वह सत्य आ गया, जिसमें कोई संदेह नहीं है। और इसमें आपके पास काफिरों के लिए उपदेश और उन मोमिनों के लिए स्मरण आया है, जो स्मरण से लाभ उठाते हैं।

Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.