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10. Yunus

Jonas · Meccan · 109 ayahs

سُورَةُ يُونُسَ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 41–50 of 109

41

وَإِن كَذَّبُوكَ فَقُل لِّى عَمَلِى وَلَكُمْ عَمَلُكُمْ ۖ أَنتُم بَرِيٓـُٔونَ مِمَّآ أَعْمَلُ وَأَنَا۠ بَرِىٓءٌۭ مِّمَّا تَعْمَلُونَ

और (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार फसादियों को खूब जानता है और अगर वह तुम्हे झुठलाए तो तुम कह दो कि हमारे लिए हमारी कार गुजारी है और तुम्हारे लिए तुम्हारी कारस्तानी जो कुछ मै करता हूँ उसके तुम ज़िम्मेदार नहीं और जो कुछ तुम करते हो उससे मै बरी हूँ

यदि (ऐ रसूल!) आपकी क़ौम के लोग आपको झुठलाएँ, तो उनसे कह दें : मेरे लिए मेरे कर्म का सवाब है और मुझे ही अपने कर्म की ज़िम्मेदारी उठानी है और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म का सवाब है और तुम्हें ही उसका दंड झेलना है। जो कुछ मैं कर रहा हूँ उसके दंड से तुम बरी हो और जो कुछ तुम कर रहे हो उसके दंड से मैं बरी हूँ।

42

وَمِنْهُم مَّن يَسْتَمِعُونَ إِلَيْكَ ۚ أَفَأَنتَ تُسْمِعُ ٱلصُّمَّ وَلَوْ كَانُوا۟ لَا يَعْقِلُونَ

और उनमें से बाज़ ऐसे हैं कि तुम्हारी ज़बानों की तरफ कान लगाए रहते हैं तो (क्या) वह तुम्हारी सुन लेगें हरगिज़ नहीं अगरचे वह कुछ समझ भी न सकते हो

बहुदेववादियों में से कुछ लोग ऐसे हैं कि जब आप क़ुरआन पढ़ते हैं, तो वे (ऐ रसूल!) आपकी ओर कान लगा लेते हैं, परंतु मानने और पालन करने के उद्देश्य से नहीं। तो क्या आप उन लोगों को सुना सकते हैं, जिनसे सुनने की शक्ति छीन ली गई है?! इसी प्रकार आप इन लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखा सकते, जो सत्य को सुनने से बहरे हैं। अतः वे उसे समझते नहीं हैं।

43

وَمِنْهُم مَّن يَنظُرُ إِلَيْكَ ۚ أَفَأَنتَ تَهْدِى ٱلْعُمْىَ وَلَوْ كَانُوا۟ لَا يُبْصِرُونَ

तुम कही बहरों को कुछ सुना सकते हो और बाज़ उनमें से ऐसे हैं जो तुम्हारी तरफ (टकटकी बाँधे) देखते हैं तो (क्या वह ईमान लाएँगें हरगिज़ नहीं) अगरचे उन्हें कुछ न सूझता हो तो तुम अन्धे को राहे रास्त दिखा दोगे

तथा बहुदेववादियों में से कुछ लोग ऐसे हैं, जो (ऐ रसूल!) आपकी ओर केवल अपनी बाह्य दृष्टि से देखते हैं, अपनी अंतर्दृष्टि से नहीं। तो क्या आप उन लोगों को प्रबुद्ध कर सकते हैं, जिन्होंने अपनी दृष्टि खो दी है?! निःसंदेह आप ऐसा नहीं कर सकते। इसी प्रकार आप अंतर्दृष्टि से वंचित व्यक्ति को सीधा मार्ग नहीं दिखा सकते।

44

إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَظْلِمُ ٱلنَّاسَ شَيْـًۭٔا وَلَٰكِنَّ ٱلنَّاسَ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ

ख़ुदा तो हरगिज़ लोगों पर कुछ भी ज़ुल्म नहीं करता मगर लोग खुद अपने ऊपर (अपनी करतूत से) जुल्म किया करते है

निःसंदेह अल्लाह अपने बंदों पर अत्याचार करने से पाक है। वह उनपर कणभर भी अत्याचार नहीं करता, परंतु वे स्वयं ही असत्य के पक्षपात, अहंकार और हठ के कारण खुद को विनाश के साधनों में लाकर अपनी जानों पर अत्याचार करते हैं।

45

وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ كَأَن لَّمْ يَلْبَثُوٓا۟ إِلَّا سَاعَةًۭ مِّنَ ٱلنَّهَارِ يَتَعَارَفُونَ بَيْنَهُمْ ۚ قَدْ خَسِرَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِلِقَآءِ ٱللَّهِ وَمَا كَانُوا۟ مُهْتَدِينَ

और जिस दिन ख़ुदा इन लोगों को (अपनी बारगाह में) जमा करेगा तो गोया ये लोग (समझेगें कि दुनिया में) बस घड़ी दिन भर ठहरे और आपस में एक दूसरे को पहचानेंगे जिन लोगों ने ख़ुदा की बारगाह में हाज़िर होने को झुठलाया वह ज़रुर घाटे में हैं और हिदायत याफता न थे

और जब क़ियामत के दिन अल्लाह लोगों को हिसाब-किताब के लिए एकत्र करेगा, तो उन्हें लगेगा कि वे अपने दुनिया के जीवन और क़ब्र में केवल दिन की एक घड़ी भर ठहरे थे, उससे ज़्यादा नहीं। वहाँ वे एक-दूसरे को पहचानेंगे। फिर उनके एक-दूसरे को पहचानने का सिलसिला क़ियामत के दिन की भयावहता को देखकर समाप्त हो जाएगा। वास्तव में, वे लोग घाटे में पड़ गए, जिन्होंने क़ियामत के दिन अपने पालनहार से मिलने को झुठलाया तथा वे दुनिया में दोबारा जीवित होने के दिन पर ईमान रखने वाले नहीं थे कि घाटे से बच सकें।

46

وَإِمَّا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ ٱلَّذِى نَعِدُهُمْ أَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَإِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ ثُمَّ ٱللَّهُ شَهِيدٌ عَلَىٰ مَا يَفْعَلُونَ

ऐ रसूल हम जिस जिस (अज़ाब) का उनसे वायदा कर चुके हैं उनमें से बाज़ ख्वाहा तुम्हें दिखा दें या तुमको (पहले ही दुनिया से) उठा ले फिर (आख़िर) तो उन सबको हमारी तरफ लौटना ही है फिर जो कुछ ये लोग कर रहे हैं ख़ुदा तो उस पर गवाह ही है

और यदि हम (ऐ रसूल!) आपको उस यातना का कुछ हिस्सा जिसका हमने उनसे वादा किया है, आपकी मृत्यु से पहले दिखा दें, या हम आपको उससे पहले मृत्यु दे दें, तो दोनों स्थितियों में उन्हें हमारे पास ही लौटकर आना है। फिर जो कुछ वे कर रहे हैं अल्लाह उससे अवगत है, उससे उनकी कोई चीज़ छिपी नहीं है और वह शीघ्र ही उन्हें उनके कर्मों का बदला देगा।

47

وَلِكُلِّ أُمَّةٍۢ رَّسُولٌۭ ۖ فَإِذَا جَآءَ رَسُولُهُمْ قُضِىَ بَيْنَهُم بِٱلْقِسْطِ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ

और हर उम्मत का ख़ास (एक) एक रसूल हुआ है फिर जब उनका रसूल (हमारी बारगाह में) आएगा तो उनके दरमियान इन्साफ़ के साथ फैसला कर दिया जाएगा और उन पर ज़र्रा बराबर ज़ुल्म न किया जाएगा

पिछले समुदायों में से प्रत्येक समुदाय के लिए एक रसूल था, जो उनकी ओर भेजा गया था। फिर जब उस (रसूल) ने उन्हें वह संदेश पहुँचा दिया, जिसे पहुँचाने का उसे आदेश दिया गया था और लोगों ने उसे झुठला दिया, तो उनके तथा रसूल के बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर दिया गया। चुनाँचे अल्लाह ने अपनी कृपा से रसूल को बचा लिया और अपने न्याय से उन लोगों को नष्ट कर दिया। तथा उनके कर्मों का बदला देने में उनके साथ कुछ भी अन्याय नहीं किया जाता।

48

وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَٰدِقِينَ

ये लोग कहा करते हैं कि अगर तुम सच्चे हो तो (आख़िर) ये (अज़ाब का वायदा) कब पूरा होगा

और ये काफ़िर लोग हठधर्मी करते हुए और चुनौती देते हुए कहते हैं : यदि तुम अपने दावे में सच्चे हो, तो बताओ कि जिस यातना का तुमने हमसे वादा किया था, उसका समय कब आएगा?!

49

قُل لَّآ أَمْلِكُ لِنَفْسِى ضَرًّۭا وَلَا نَفْعًا إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُ ۗ لِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌ ۚ إِذَا جَآءَ أَجَلُهُمْ فَلَا يَسْتَـْٔخِرُونَ سَاعَةًۭ ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मै खुद अपने वास्ते नुकसान पर क़ादिर हूँ न नफा पर मगर जो ख़ुदा चाहे हर उम्मत (के रहने) का (उसके इल्म में) एक वक्त मुक़र्रर है-जब उन का वक्त आ जाता है तो न एक घड़ी पीछे हट सकती हैं और न आगे बढ़ सकते हैं

(ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : मैं स्वयं अपने लिए न किसी हानि का मालिक हूँ कि स्वयं को उससे नुक़सान पहुँचाऊँ या ख़ुद से उसे हटा सकूँ, और न ही किसी लाभ का मालिक हूँ कि उससे स्वयं को फायदा पहुँचाऊँ। तो मैं किसी और को कैसे फायदा या नुक़सान पहुँचा सकता हूँ? सिवाय उसके जो अल्लाह उसमें से चाहे, तो फिर मैं उसके ग़ैब की बातों को कैसे जान सकता हूँ? प्रत्येक समुदाय, जिसे अल्लाह ने विनाश की धमकी दी है, उसके विनाश का एक समय निर्धारित है, जिसका ज्ञान केवल अल्लाह को है। अतः जब उसके विनाश का समय आ जाता है, तो वे उससे न कुछ पीछे रह सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं।

50

قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِنْ أَتَىٰكُمْ عَذَابُهُۥ بَيَٰتًا أَوْ نَهَارًۭا مَّاذَا يَسْتَعْجِلُ مِنْهُ ٱلْمُجْرِمُونَ

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या तुम समझते हो कि अगर उसका अज़ाब तुम पर रात को या दिन को आ जाए तो (तुम क्या करोगे) फिर गुनाहगार लोग आख़िर काहे की जल्दी मचा रहे हैं

(ऐ रसूल!) आप यातना की जल्दी मचाने वालों से कह दें : मुझे बताओ कि यदि तुमपर अल्लाह की यातना रात या दिन के किसी समय आ जाए, तो आख़िर कौन-सी चीज़ है, जिसे तुम इस यातना से जल्दी चाहते हो?!

Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.