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10. Yunus

Jonas · Meccan · 109 ayahs

سُورَةُ يُونُسَ

Reading Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies

Ayahs 91–100 of 109

91

ءَآلْـَٰٔنَ وَقَدْ عَصَيْتَ قَبْلُ وَكُنتَ مِنَ ٱلْمُفْسِدِينَ

अब (मरने) के वक्त र्ऌमान लाता है हालॉकि इससे पहले तो नाफ़रमानी कर चुका और तू तो फ़सादियों में से था

क्या तू जीवन से निराश होने के बाद अब ईमान ला रहा है?! हालाँकि (ऐ फ़िरऔन!) तू अल्लाह की यातना उतरने से पहले, उसका इनकार करके और उसके रास्ते से रोककर, अल्लाह की अवज्ञा करता रहा है और तू बिगाड़ पैदा करने वालों में से था, क्योंकि तू स्वयं पथभ्रष्ट था और दूसरों को भी पथभ्रष्ट करता था।

92

فَٱلْيَوْمَ نُنَجِّيكَ بِبَدَنِكَ لِتَكُونَ لِمَنْ خَلْفَكَ ءَايَةًۭ ۚ وَإِنَّ كَثِيرًۭا مِّنَ ٱلنَّاسِ عَنْ ءَايَٰتِنَا لَغَٰفِلُونَ

तो हम आज तेरी रुह को तो नहीं (मगर) तेरे बदन को (तह नशीन होने से) बचाएँगें ताकि तू अपने बाद वालों के लिए इबरत का (बाइस) हो और इसमें तो शक़ नहीं कि तेरे लोग हमारी निशानियों से यक़ीनन बेख़बर हैं

आज हम तुझे (ऐ फिरऔन!) समुद्र से निकाल लेंगे और तुझे एक ऊँचे स्थान पर डाल देंगे, ताकि तेरे बाद आने वाले लोग तुझसे सीख ग्रहण करें। वास्तव में अधिकतर लोग हमारे तर्कों और हमारी शक्ति के प्रमाणों से अनभिज्ञ हैं, उनमें सोच-विचार नहीं करते।

93

وَلَقَدْ بَوَّأْنَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ مُبَوَّأَ صِدْقٍۢ وَرَزَقْنَٰهُم مِّنَ ٱلطَّيِّبَٰتِ فَمَا ٱخْتَلَفُوا۟ حَتَّىٰ جَآءَهُمُ ٱلْعِلْمُ ۚ إِنَّ رَبَّكَ يَقْضِى بَيْنَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَٰمَةِ فِيمَا كَانُوا۟ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ

और हमने बनी इसराइल को (मालिक शाम में) बहुत अच्छी जगह बसाया और उन्हं अच्छी अच्छी चीज़ें खाने को दी तो उन लोगों के पास जब तक इल्म (न) आ चुका उन लोगों ने एख्तेलाफ़ नहीं किया इसमें तो शक़ ही नहीं जिन बातों में ये (दुनिया में) बाहम झगड़े रहे है क़यामत के दिन तुम्हारा परवरदिगार इसमें फैसला कर देगा

और हमने बनी इसराईल को शाम (लेवंत) की धन्य भूमि में एक सुखद स्थान और एक मनभावन ठिकाना दिया और उन्हें हलाल व शुद्ध चीज़ों से जीविका प्रदान की। फिर उन्होंने अपने धर्म के मामले में मतभेद नहीं किया, यहाँ तक कि उनके पास क़ुरआन आ गया, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के उन गुणों एवं विशेषताओं की पुष्टि करने वाला है, जो उन्होंने तौरात में पढ़ा था। फिर जब उन लोगों ने इसका इनकार कर दिया, तो उनके क्षेत्रों को छीन लिया गया। निश्चय ही (ऐ रसूल!) आपका पालनहार क़ियामत के दिन उनके बीच उस चीज़ के बारे में फ़ैसला कर देगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे थे। फिर वह उनमें से सत्यवादी और असत्यवादी को वह बदला देगा, जिसका उन दोनों में से प्रत्येक हक़दार होगा।

94

فَإِن كُنتَ فِى شَكٍّۢ مِّمَّآ أَنزَلْنَآ إِلَيْكَ فَسْـَٔلِ ٱلَّذِينَ يَقْرَءُونَ ٱلْكِتَٰبَ مِن قَبْلِكَ ۚ لَقَدْ جَآءَكَ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُمْتَرِينَ

पस जो कुरान हमने तुम्हारी तरफ नाज़िल किया है अगर उसके बारे में तुम को कुछ शक़ हो तो जो लोग तुम से पहले से किताब (ख़ुदा) पढ़ा करते हैं उन से पूछ के देखों तुम्हारे पास यक़ीनन तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से बरहक़ किताब आ चुकी तो तू न हरगिज़ शक़ करने वालों से होना

यदि (ऐ रसूल!) आप उस क़ुरआन की सच्चाई के बारे में, जो हमने आपकी ओर उतारा है, संदेह और अचरज में हैं, तो ईमान लाने वाले उन यहूदियों से पूछ लें जो तौरात पढ़ते हैं और उन ईसाइयों से पूछ लें जो इंजील पढ़ते हैं। वे आपको बताएँगे कि आपपर जो उतारा गया है, वह सत्य है; क्योंकि वे अपनी पुस्तकों में उसका विवरण पाते हैं। निःसंदेह आपके पास आपके पालनहार की ओर से वह सत्य आया है, जिसमें कोई संदेह नहीं है। अतः आप कदापि संदेह करने वालों में से न हों।

95

وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ فَتَكُونَ مِنَ ٱلْخَٰسِرِينَ

न उन लोगों से होना जिन्होंने ख़ुदा की आयतों को झुठलाया (वरना) तुम भी घाटा उठाने वालों से हो जाओगे

और आप कदापि उन लोगों में से न हों, जिन्होंने अल्लाह के तर्कों एवं प्रमाणों को झुठला दिया। अन्यथा इसकी वजह से आप उन घाटा उठाने वाले लोगों में से हो जाएँगे, जिन्होंने अपने अविश्वास के कारण अपने आपको विनाश से ग्रस्त करके खुद अपना घाटा किया। यह सारी चेतावनी शक और इनकार के खतरे एवं गंभीरता को बयान करने के लिए है, अन्यथा नबी इस बात से मा'सूम (पवित्र) हैं कि उनकी ओर से इस तरह की कोई बात सामने आए।

96

إِنَّ ٱلَّذِينَ حَقَّتْ عَلَيْهِمْ كَلِمَتُ رَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ

(ऐ रसूल) इसमें शक़ नहीं कि जिन लोगों के बारे में तुम्हारे परवरदिगार को बातें पूरी उतर चुकी हैं (कि ये मुस्तहके अज़ाब हैं)

निःसंदेह जिन लोगों के विषय में अल्लाह का फ़ैसला सिद्ध हो चुका है कि वे कुफ़्र पर जमे रहने के कारण कुफ़्र ही पर मरेंगे, वे कभी भी ईमान नहीं लाएँगे।

97

وَلَوْ جَآءَتْهُمْ كُلُّ ءَايَةٍ حَتَّىٰ يَرَوُا۟ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَلِيمَ

वह लोग जब तक दर्दनाक अज़ाब देख (न) लेगें ईमान न लाएंगें अगरचे इनके सामने सारी (ख़ुदाई के) मौजिज़े आ मौजूद हो

यद्यपि उनके पास प्रत्येक धार्मिक अथवा ब्रह्मांडीय निशानी आ जाए। यहाँ तक कि वे दर्दनाक यातना अपनी आँखों से देख लें, तब वे ईमान ले आएँगे, जबकि उस समय ईमान लाना उनको लाभ नहीं देगा।

98

فَلَوْلَا كَانَتْ قَرْيَةٌ ءَامَنَتْ فَنَفَعَهَآ إِيمَٰنُهَآ إِلَّا قَوْمَ يُونُسَ لَمَّآ ءَامَنُوا۟ كَشَفْنَا عَنْهُمْ عَذَابَ ٱلْخِزْىِ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَمَتَّعْنَٰهُمْ إِلَىٰ حِينٍۢ

कोई बस्ती ऐसी क्यों न हुई कि ईमान क़ुबूल करती तो उसको उसका ईमान फायदे मन्द होता हाँ यूनूस की क़ौम जब (अज़ाब देख कर) ईमान लाई तो हमने दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी में उनसे रुसवाई का अज़ाब दफा कर दिया और हमने उन्हें एक ख़ास वक्त तक चैन करने दिया

ऐसा नहीं हुआ है कि जिन बस्तियों की ओर हमने अपने रसूलों को भेजा था, उनमें से कोई बस्ती यातना देखने से पहले सार्थक रूप से ईमान लाई हो, फिर यातना देखने से पहले ईमान लाने के कारण उसका ईमान उसे लाभ पहुँचाया हो, सिवाय यूनुस अलैहिस्सलाम की क़ौम के, कि जब वे सच्चा ईमान ले आए, तो हमने सांसारिक जीवन में उनके ऊपर से अपमान व तिरस्कार के अज़ाब को हटा दिया और उन्हें उनकी समय सीमा समाप्त होने तक (दुनिया की सामग्रियों से) लाभान्वित होने का अवसर प्रदान किया।

99

وَلَوْ شَآءَ رَبُّكَ لَءَامَنَ مَن فِى ٱلْأَرْضِ كُلُّهُمْ جَمِيعًا ۚ أَفَأَنتَ تُكْرِهُ ٱلنَّاسَ حَتَّىٰ يَكُونُوا۟ مُؤْمِنِينَ

और (ऐ पैग़म्बर) अगर तेरा परवरदिगार चाहता तो जितने लोग रुए ज़मीन पर हैं सबके सब ईमान ले आते तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो ताकि सबके सब ईमानदार हो जाएँ हालॉकि किसी शख़्स को ये एख्तेयार नहीं

और यदि (ऐ रसूल!) आपका पालनहार धरती में मौजूद सभी लोगों को ईमान वाला बनाना चाहता, तो सभी लोग अवश्य ईमान ले आते, परंतु अपनी हिकमत के कारण उसने ऐसा नहीं चाहा। अतः वह जिसे चाहता है, अपने न्याय से गुमराह कर देता है और जिसे चाहता है, अपनी कृपा से मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसलिए आप लोगों को ईमान लाने पर मजबूर नहीं कर सकते। क्योंकि उन्हें ईमान लाने की तौफ़ीक़ देना केवल अल्लाह के हाथ में है।

100

وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَن تُؤْمِنَ إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ وَيَجْعَلُ ٱلرِّجْسَ عَلَى ٱلَّذِينَ لَا يَعْقِلُونَ

कि बगैर ख़ुदा की इजाज़त ईमान ले आए और जो लोग (उसूले दीन में) अक़ल से काम नहीं लेते उन्हीं लोगें पर ख़ुदा (कुफ़्र) की गन्दगी डाल देता है

किसी भी व्यक्ति के लिए संभव नहीं है कि वह अल्लाह की अनुमति के बिना अपने आप ईमान ले आए। अतः अल्लाह की इच्छा के बिना ईमान नहीं पाया जा सकता। इसलिए आप उनपर अफ़सोस न करें। अल्लाह उन लोगों पर यातना और अपमान डाल देता है, जो उसके प्रमाणों व तर्कों तथा उसके आदेशों और निषेधों को नहीं समझते हैं।

Commentary: Al-Mukhtasar in Interpreting the Noble Qur'an by Tafsir Center for Quranic Studies. Qur'an text and translation via AlQuran Cloud.